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अन्ना की लहर

हम और आप भ्रष्टाचार की इस मुहिम में शामिल है आखिर क्यूं ये सवाल पैदा होना लाजिमी है। रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में हम भ्रष्ट तंत्र से दो चार होते है। देश के कोने कोने में अन्ना की लहर है, आज़ादी के बाद यह सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक आन्दोलन है। अहिंसा, सत्याग्रह ये शब्द ही केवल नहीं बल्कि इसी हथियार के बदौलत हमने अपनी आज़ादी को पाया है। आज़ाद भारत में भ्रष्ट तंत्र को आम आदमी कब तक बर्दास्त करेगा । हामारे नेता निष्ठुर हो गए है नेतृत्व को पटरी पर लाने का काम अब जन आन्दोलन है ऐसे में सरकार का यह जन आन्दोलन को कुचलने का यह मनमाना रोवैया लोकतंत्र की भावना के विपरीत है। अन्ना हजारे के पीछे जनता खुद की आवाज़ में भ्रष्ट्र तंत्र के किलाफ सडको में उत्तर आई है। गाव गाव शहर शहर अन्ना की लहर बहती रहेगी और करवा जुड़ता रहेगा और जनतंत्र और सशक्त होगा। निसंदेह।

शौपिंग हैबिट कही नशा तो nahee

आजकल अनवाश्यक खरीदारी बढाती जा रही है। बाज़ार की चकाचौंध का असर लोगो के बजट पर भी पड़ रहा है। इस महंगाई में घर चलना क्रिकेट वर्ल्ड कप जीतने के बराबर है। लेकिन हर तरफ विज्ञापन के माया जाल में अगर आप घिर गये है तो निश्चित मानिये की ये विज्ञापन अनवाश्यक खरीदारी के लिए प्रेरित भी करते है। शोधो से यह पता चलता है की अनवाश्यक खरीदारी की ये आदत शोपींग हैबत बन जाती है जिसके चलते आप मानसिक रूप से बीमार पड़ जाएँगे। स्टेटस सिम्बल की फिक्र रिचमंड और इलिनियोस विश्विद्यालय के अलग -अलग शोधो से मालूम होया है कि धीरे-धीरे शोपिंग हैबिट आदमी में नशे का रूप ले लेता है। इस आदत के चलते लोग शोपिंग करते बड़ी से बड़ी कीमत चुकाने के लिए तैयार हो जाते है, फिर भी uhene संतोष नहीं मिलता बहुत से लोगो कि आदत hoti है कि शोपिंग हैबिट के चलते koi kharidi vashu ko chupate है। taki ma hngi ya kharab vastu hone के karan लोग unka majak na banaye। aise लोग adhik adhik pase soping में kahrch करते है अगर inke pas paise nahee है तो dusro के sath unki शोपिंग के लिए बड़ी shvecha से sath में jayenge। के लिए शोपिंग karan कि आदत में

मन का अंकुर

मन का अंकुर फूट जाने तक मई प्रतीक्षारत हूँ अपने अस्तित्व के प्रति ध्यैय है मुझे मिटटी के व्यवहार से, जल के शिष्टाचार से अंकुरित होने तक अपने अस्तीत्व के प्रति मझे सावधान रहना है आंकना है मुझे मिटटी में जल की संतुलित नमी को asntulit होने पर मै सड़ सकता हूँ पुराने विचारो के दीमक मै कहीं मैं दब न जाऊं नवीनता अवशोषण मै अंकुरित होने से पहले सत्य की प्रकाश मुझे बचा सकती है टूट जाने से पाले फूटने दो मेरे मन का अंकुर मुझे santulit होने दो vecharo के bech me

विरासत

कई बार चुनाव जीतें हर बार आ बैठें घोसले में बच्चों को सिखाया राजनीति के दाव-पैतरे क्योंकि उनके बाद उन्हें संभालनी थीं विरासत की सत्ता क ्योंकि देश को चलन था वंशो की बैशाखी पर। अभिषेक कान्त पाण्डेय

कल्पना

आधुनिक विकिरण से निकली एक नई उर्जा। उड़ान भरी वह किरण जिसने छू लिया कल्पना के अन्तरिक्ष को वह आंसू पर लिपि राख़ नहीं उर्जा है अणु परमाणु की कैसे गिरती ये बंदेन वह जो चमक उठेगी नभ में। हाथ में कंगन दो चुटकी सेंदूर केवल लक्ष्य नहीं नयी रह नयी चाह है अब यही। अभिषेक कान्त पाण्डेय

भूख

ankho ki atal gahriyon me chipi hai chah zevan ki saundryta ke abimb men chah nahi kisi bimb ki itihas ke panne jahkaten hain bhavishya ke gart mein tab vartman ke man mein uthta bas ek hi sawal bhookhe pet ki roti kahan?

तिरंगा कहता है

ये तिरंगा कहता है सुन लो भारतवासी देश के खातिर परवानो ने चूम लिया फासी बहुतो की क़ुरबानी ने दी हमें आज़ादी, आज़ादी की कीमत पहचानो न करो इसकी बर्बादी । ये देश -शहीदों की भूमि हैं, क्वाबा-काशी ये तिरंगा कहता है सुन लो भारतवासी। स्वार्थी जीवन में हम भूल गएँ अपनी आज़ादी। मर रहा है किसान यहाँ, नेता बेच रहा खादी। लोकतंत्र में बेहाल है, भारत का गरीब निवासी। ये तिरंगा कहता है सुन लो भारतवासी। भ्रष्ट-अधिकारी नेता खा रहें है, देश का पैसा व्यापारी मस्त है मुनाफाखोरी में ये देश है कैसा। भ्रष्टाचार-आतंकवाद देश को बना रहा है दासी। ये तिरंगा कहता है सुन लो भारतवासी। शहीदों के सपनो को हुम न टूटने देंगें। घर-घर शिक्षा का दीपक जलांगे। भारत के युवा तुम हो कर्णधार, लो सपथ ये साहसी। ये तिरंगा कहता है सुन लो भारतवासी। अभिषेक कान्त पाण्डेय