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जनवरी, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

विरासत

कई बार चुनाव जीतें हर बार आ बैठें घोसले में बच्चों को सिखाया राजनीति के दाव-पैतरे क्योंकि उनके बाद उन्हें संभालनी थीं विरासत की सत्ता क ्योंकि देश को चलन था वंशो की बैशाखी पर। अभिषेक कान्त पाण्डेय

कल्पना

आधुनिक विकिरण से निकली एक नई उर्जा। उड़ान भरी वह किरण जिसने छू लिया कल्पना के अन्तरिक्ष को वह आंसू पर लिपि राख़ नहीं उर्जा है अणु परमाणु की कैसे गिरती ये बंदेन वह जो चमक उठेगी नभ में। हाथ में कंगन दो चुटकी सेंदूर केवल लक्ष्य नहीं नयी रह नयी चाह है अब यही। अभिषेक कान्त पाण्डेय

भूख

ankho ki atal gahriyon me chipi hai chah zevan ki saundryta ke abimb men chah nahi kisi bimb ki itihas ke panne jahkaten hain bhavishya ke gart mein tab vartman ke man mein uthta bas ek hi sawal bhookhe pet ki roti kahan?

तिरंगा कहता है

ये तिरंगा कहता है सुन लो भारतवासी देश के खातिर परवानो ने चूम लिया फासी बहुतो की क़ुरबानी ने दी हमें आज़ादी, आज़ादी की कीमत पहचानो न करो इसकी बर्बादी । ये देश -शहीदों की भूमि हैं, क्वाबा-काशी ये तिरंगा कहता है सुन लो भारतवासी। स्वार्थी जीवन में हम भूल गएँ अपनी आज़ादी। मर रहा है किसान यहाँ, नेता बेच रहा खादी। लोकतंत्र में बेहाल है, भारत का गरीब निवासी। ये तिरंगा कहता है सुन लो भारतवासी। भ्रष्ट-अधिकारी नेता खा रहें है, देश का पैसा व्यापारी मस्त है मुनाफाखोरी में ये देश है कैसा। भ्रष्टाचार-आतंकवाद देश को बना रहा है दासी। ये तिरंगा कहता है सुन लो भारतवासी। शहीदों के सपनो को हुम न टूटने देंगें। घर-घर शिक्षा का दीपक जलांगे। भारत के युवा तुम हो कर्णधार, लो सपथ ये साहसी। ये तिरंगा कहता है सुन लो भारतवासी। अभिषेक कान्त पाण्डेय