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अभिषेक कांत पांडेय हम पिजड़ों में  हम सब ने एक नेता चुन लिया। उसने कहा उड़ चलो। ये बहेलिया की चाल है, ये जाल लेकर एकता शक्ति है। हम सब चल दिये नेता के साथ नई आजादी की तरफ हम उड़ रहें जाल के साथ। आजादी और नेता दोनों पर विश्वास हम पहुंच चुके थे एक पेड़ के पास अब तक बहेलिया दिखा नहीं, अचानक नेता ने चिल्लाना शुरू किया एक अजीब आवाज- कई बहेलिये सामने खड़े थे नेता उड़ने के लिए तैयार बहेलिये की मुस्कुराहट और नेता की हड़बड़हाट एक सहमति थी । हम एक कुटिल चाल के शिकार नेता अपने हिस्से को ले उड़ चुका था बहेलिया एक कुशल शिकारी निकला सारे के सारे कबूतर पिजड़े में, अब हम सब अकेले। इन्हीं नेता के हाथ आजाद होने की किस्मत लिए किसी राष्ट्रीय पर्व में बन जाएंगे शांति प्रतीक। फिर कोई नेता और बहेलिया हमें पहुंचा देगा पिजड़ों में।  यथार्थ वह दीवारों से निकल गई विचारों से लड़ रही सही मायने में मकानों को घरों में तब्दील कर रही यर्थाथ है उसका जीवन चूल्हों पर लिपी आंसू नहीं उर्ज़ा है अणु परमाणु की आसमान में बादलों की नीर नहीं  केंद्र बिदु है समाज की नजरें लटकती लाशें उस हुक्मरान के ख