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मई, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

उत्तर प्रदेश में अगला कौन

अभिषेक कांत पाण्डेय संभवत: 2017 के शुरुआती चरण में उत्तर प्रदेश में चुनाव हो। ऐसे में यहां पर राजनीतिक हलचल बढ़ना स्वाभाविक है। प्रदेश की सत्ता से लम्बे अर्से से भारतीय जनता पार्टी दूर रही है। इस बार उत्तर प्रदेश में सत्ता संभालने की जुगत में लगी हुई है, वहीं वर्तमान सपा सरकार से युवाओं का आकर्षण भी टूटा है। जिस युवाओं ने यूपी का ताज अखिलेश को पहनाया आज वही युवा ठगा हुआ महसूस कर रहा है। बढ़ती बेरोजगारी और सरकारी नौकरी में कोर्ट कचहरी में मामला पहुंचने पर ये बात जाहिर है ​कि सपा सरकार की नीति कारगर नहीं है। खासकार युवा बेरोजगार इनके शासनकाल में सबसे ज्यादा परेशान हैं। वहीं केंद्र में काबिज भारतीय जनता पार्टी ने शानदार दो साल की उपलब्धि का जश्न मना रही है। ऐसे में उत्तर प्रदेश में बसपा, कांग्रेस, सपा का पारंपरिक जनाधार भी खिसने वाला है। केंद्र सरकार के कामकाज के कई सर्वे पीएम मोदी को बेहतर बता रही है। ऐसे में माना जा सकता है कि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भाजपा वापसी करेगी। जिस तरह केंद्र में विकास का मुद्दा हावी रहा, उस आधार उत्तर प्रदेश में भी विकास की बयार की बात इस चुनाव म

क्या आप कल्पना कर सकते हैं

  मई की तपती गरमी में पानी की किल्लत आम बात है। वायुमंडल में आग का गोला बरस रहा है। उत्तर भारत के साथ देश के पहाड़ी क्षेत्र भी भीषण गरमी की चपेट में है। पिछले पचास सालों में पर्यावरण को जबरजस्त नुकसान पहुंचा है। आज भी हम क्रंकीट के शहर में खुद को प्रकृति से दूर करते जा रहे हैं। जंगल की आग हो या इसके बाद नदियों में उठने वाला उफान इन प्राकृतिक आपदा के हम ही जिम्मेदार है। पहाड़ों पर हमारी हद से ज्यादा बढ़ती दखलअंदाजी हमने वहां के वातावरण को भी नहीं बक्सा। मैदानी क्षेत्रों में जल की समुचित व्यवस्था की पहल करने में भी हमने कोई रुचि नहीं दिखायी। देखा जाये तो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने का काम इस सदी में सबसे अधिक हम ही लोगों ने किया है। वाहन से निकलता धुंआ भले सुख — सुविधा का प्रतीक हो या हमारी तरक्की को उजागर करता फैक्टरियों से निकलता धुंआ। पर पर्यावरण को बचाने के लिए हम पेड़ों को लगाने व उन्हें जिलाने की अपनी जिम्मेदारी से दूर भाग रहे हैं। पिछले पखवारे चीन के बीजिंग शहर और उसके आसपास के इलाके में प्रदूषण के कारण धूल भरी आंधी से पूरा शहर धूंए के बादल और धूल के चपेट में रहा है। वहां के
सामान नागरिकता कानून, प्राइवेट क्षेत्रों में न्यूनतम वेतन निर्धारण, पत्रकारों को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार मजीठीया द्वारा गठित वेतन अखबार मालिकों से दिलवाने की पहल, कांग्रेस के लंबे शासनकाल में पुलिस सुधार पर कोई ठोस काम नहीं हुआ, बीजेपी इस पर काम कर सकती है। पुलिस सुधार जरूरी है। अंग्रेजों के समय की पुलिस नियमावली व कानून से आजाद भारतीयों को छुटकारा मिले। कांग्रेस के समय आरटीई यानी अनिवार्य निशुल्क शिक्षा कानून का पालन राज्यों को ठोस रूप से करवाना, इसकी शुरुआत बीजीपीशासित राज्यों से हो तो कितना अच्छा उदाहरण बनें।

प्राइवेट क्षेत्र में न्यूनतम वेतन कब

अभिषेक कांत पाण्डेय हर किसी के जीवन में कुछ न कुछ ऐसा अनुभव होता है जो सोचने पर मजबूर करता है। ऐसे अनुभवों में मैं पिछले महीने से जूझ रहा हूं। ये मेरा व्यक्तिगत अनुभव है लेकिन सही मायने में ये दर्द हर उस व्यक्ति का है जो जीना चाहता है, सम्मान की जिंदगी चाहता है। भारत में रहने वाले उन करोड़ों लोगों की कहानी है। इसमें मजदूर से लेकर महीने पगार पाने वाले कामगार, ठेके पर मजदूरी करने वाले या किसी कंपनी में कंप्यूटर वर्क करने वाले यहां तक की पत्रकार, शिक्षक, हर वो कोई जो अपने हाथों से मेहनत करता है, उसके बदले उस बेहतर जिंदगी के लिए उचित वेतन पाने का अधिकार है। लेकिन इन प्राइवेट क्षेत्रों में सही सरकारी नीति का न होना व कामगारों के लिए ठोस कानून का नहीं होना, यहां पर करोड़ों लोग अपनी जिंदगी होम कर रहे हैं। कम वेतन  व काम के अधिक घंटे उनके प्रकृतिक जीवन के साथ खिलवाड़ है। बेगारी व शोषण के शिकार  ऐसे लोग उन नियोक्ता के लिए काम करते हैं, जो वाता​नुकूलित ढांचों में सांसें लेते हैं और काम कराने के लिए ऐसे वर्गों का उदय किया है जो बिल्कुल अंग्रेजों के जमीदारों के भूमिका में है, ऐसे चुनिंदा मैनेज

रेल पटरियों पर भटकता बचपन

अभिषेक कांत पाण्डेय रेलगाड़ी में सफर करने का आनंद आपने लिया होगा लेकिन शायद ही कभी आपने गौर किया होगा कि स्टेशन व ट्रेन के बीच मासूम बच्चों की जिंदगी कहीं खो गई है। खेत-खलियान व शहरों से गुजरती हुई रेलगाड़ी जब स्टेशन पर रूकती है तो अपकी निगाह उन बच्चों पर जरूर ठहरी होगी, जो रेलवे ट्रेक पर पानी की बोतलें इकट्ठा करते हैं, या उन बच्चों की टोलियों को देखा होगा जिनके गंदे-मैले कपड़े उनकी बदहाली को बयां करते हैं। हाथ में गुटखा-खैनी का पाउच लिए टेªन की बोगियों में बेचते हैं, देश के ये नौनिहाल। जहां इन्हें स्कूलों में होना चाहिए लेकिन पापी पेट के कारण यहां इनकी जिंदगी के हिस्से में केवल ट्रेन की सीटी ही सुनाई देती है। इन बच्चों का जीवन सुबह पांच बजे से शुरू होता है, स्कूल की घंटी नहीं ट्रेन की सीटी सुनकर झुंड में निकल पड़ते हैं इनके कदम और ट्रेन की बोगियों में गुटखा-खैनी बेचकर अपने घर का पेट पालते हैं। स्टेशन में रहने वाले बच्चों का उम्र तो बढ़ता है लेकिन उनका भविष्य यहां अंधकारमय है। रेलेवे स्टेशन में कठिन परिस्थितियों में रह रहे बच्चों के लिए काम करने वाली स्वयंसेवी संस्था साथी व चाइल्ड लाइन