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जून, 2019 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

एकल नाटक 'कितने टोबा टेक सिंह' का मंचन

रंगमंच-समीक्षा अभिषेक कांत पांडेय उर्दू के मशहूर लेखक सआदत हसन मंटो की कहानी 'टोबा टेक सिंह' पर आधारित एकल नाटक 'कितने टोबा टेक सिंह' का मंचन 21 जून को प्रयागराज में इलाहाबाद विश्वविद्यालय  के डॉ० ए० एन० झा छात्रावास में किया गया। एकल अभिनय में मलय मिश्र ने शुरू से आखिरी तक अभिनय के माध्यम से कई किरदारों को जिंदा किया। 'टोबा टेक सिंह' कहानीकार सआदत हसन मंटो द्वारा लिखी, 1955 में प्रकाशित हुई प्रसिद्ध कहानी है। यह भारत-पाकिस्तान के विभाजन के दो साल बाद के लाहौर के एक पागलख़ाने के पागलों पर आधारित है। भारत और पाकिस्तान के विभाजन के बाद लाहौर के पागलखाने में बंद हिंदू और सिख पागलों को हिंदुस्तान के पागलखाने में शिफ्ट किया जा रहा था। मंटो ने इन पागल किरदारों के माध्यम से हिंदुस्तान और पाकिस्तान के विभाजन की त्रासदी पर सवाल उठाया है।  कहानी का एक पागल पात्र जिसका  नाम किशन सिंह है, वह टोबा टेक सिंह नाम के गाँव में रहता था। जब उसे हिंदुस्तान लाया जा रहा था तो  उसने  सिपाहियों से पूछा, तो पता चला की टोबा टेक सिंह नाम का स्थान अब पाकिस्तान देश का हिस्सा गया है। स

नये प्रयोग के रूप में मृच्छकटिकम् नाटक का सफल मंचन

रंगमंच नाटक समीक्षा- अभिषेक कांत पांडेय प्रयागराज। उत्तर मध्य सांस्कृतिक केंद्र के प्रेक्षागृह में  प्रख्यात  संस्कृत नाटक  'मृच्छकटिकम्'  का मंचन  12 जून को किया गया। भारतीय रंगमंच एक कला और विज्ञान की तरह है। आज भी रंगमंच सभी कलाओं का केंद्र बिंदु है,आधुनिक संचार साधनों ने रंगमंच को एक नया रूप दिया है लेकिन आज भी रंगमंच दर्शकों को जीवंतता  की अनुभूति कराता है।भारतीय रंगमंच का प्रारंभ वेदों के संवाद सूक्त से माना जाता है। भरतमुनि ने अपने ग्रंथ 'नाट्यशास्त्र' में नाटकक के कला और विज्ञान को बताया है। संस्कृत नाटकों के मंचन में कला सौंदर्य के साथ-साथ तकनीक ने इसे पूरी दुनिया के सामने प्रस्तुत किया है। नाट्य कला का यह भव्य रूप मृच्छकटिकम् के मंचन पर 12 जून 2019 को प्रयागराज के उत्तर मध्य सांस्कृतिक केंद्र, प्रेक्षागृह में देखने को मिला। यह नाटक 'शूद्रक' द्वारा लिखा गया था जोकि मूल संस्कृत भाषा में है लेकिन वर्तमान में इसे हिंदी भाषा में प्रस्तुत कर दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित किया गया है। देशकाल को लांघते हुए यह नाटक प्रस्तुति के नए प्रयोग में असीम ऊँचाइयों को

भारत को कब मिलेगी अधिकारिक रूप से राष्ट्रभाषा और उसकी भाषायी पहचान

भारत की  क्षेत्रीय भाषाओं पर अंग्रेजी हावी है, यह आप समझिए। हिंदी का विरोध करनेवाले इंग्लिश सीख लेंगे लेकिन हिंदी से इनको परहेज है, जो भाषा सारे समाज व देश को जोड़ती है, उसका सम्मान होना चाहिए। आप तर्कों को समझने की कोशिश कीजिए। हिंदी का विरोध करने वाले और अंग्रेजी का सपोर्ट करने वाले चंद ऐसे सामंतवादी विचारधारा के लोग हैं जो पूंजीवादी विचारधारा को लेकर चलते हैं, और अंग्रेजी में ही अपनी रोजी रोटी चला रहें। कुछ लोग अपनी क्षेत्रीय भाषा को सामने रखकर 'हिंदी'  का विरोध करते हैं। ऐसे हिंदी बेल्ट में भी लोग हैं। यह भी पढ़ें छोटी सी झपकी आपको बनाए फ्रेश रिसर्च लिखने और पढ़ने में दिमाग अलग-अलग तरह से सोचता है मैथ का भूत हटाओ ये टिप्स अपनाओ मातापिता चाहते हैं कि उनका बच्चा अच्छी आदतें सीखें और अपने पढ़ाई में आगे रहें, लेकिन आप चाहे तो बच्चों में अच्छी आदत का विकास कर सकते .. असल में हिंदी प्रदेशों के कुछ पूंजीवादी और सामंती विचारधारा के लोग बहाना बनाकर अंग्रेजी का महिमामंडन कर के अंग्रेजी भाषा को आजादी से लेकर अब तक पाल रहे हैं। अंग्रेजी सोच, अंग्रेजी पूंजीवादी व्यवस्था, अंग