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कैसी है तुम्हारी भाषा सबसे बड़ी भाषा संकेत की भाषा मूक होकर विरोध या सहमति की भाषा नहीं है कोई व्याकरण, न ध्वनि है प्रेम, दया व करुणा की भाषा की। ​बदल दिया जिसने अशोक को तुम क्यों नहीं बदले अह्म। तुम्हें पसंद नहीं रोते मासूमों की भाषा तुम्हें पसंद नहीं करुण पुकार की भाषा नहीं है क्या पसंद मिट्टी से उगते पौधे की भाषा। क्रंक्रीट सा मन तुम्हारा पसंद है तुम्हें खट खट की भाषा पसंद है तुम्हें टूटती सड़कों, गिरते पुल की ध्वनि तुम्हें पसंद है मेहनतकश हडि्डयों की चरचराने की भाषा तुम्हें तो पसंद है नोट फड़फड़ी तिंजोरी में बंद आवाजें। माना तुम्हारी भाषा संस्कार नहीं पर तुम तो आदिम भी नहीं उनके पास भी थी एक सरल भाषा वे महसूस कर लेते थे इंसानियत बचा लेते थे अपने जैसे इंसानो को पर तुम तो अपने पूर्वजों से हो अलग तुम्हारी भाषा व तुम्हारी परिभाषा बांटती है इंसानों को और तुम विजेता बन गढ़ लेते हो एक नया व्याकरण हर बार तुम नकार देते हो इंसानियत की भाषा। सर्वाधिकार सुरक्षित अभिषेक कांत पाण्डेय 8 अक्टूबर, 2017

जनता के मन में मोदी

अभिषेक कांत पाण्डेय भड्डरी उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव में भाजपा की शानदार जीत कई मायनों में अलग है। इस बार जनता ने जाति व धर्म से उपर उठकर वोटिंग किया। अब तक जिस तरह से जाति व धर्म के ध्रुवीकरण की गणित के जरिये किसी पार्टी के वोटर गिने जाते रहे हैं, वहीं उत्तर प्रदेश की जनता ने राजनैतिक पार्टियों को लोकतंत्र का सही मतलब बतला दिया। किसी खास जाति वर्ग के चंद लोगों को लाभ देकर, उस जाति वर्ग व धर्म को वोटबैंक समझने की सोच में जीने वाले नेताओं की सोच पर भी यूपी की जनता ने करारा जवाब दिया। इस चुनाव में जनता ने बता दिया कि जाति व धर्म में बांटकर राजनीति करनेवालों के लिए भारत की राजनीति में कोई जगह नहीं है। बीजेपी की तरफ हर वर्ग जाति व धर्म के लोगों का झुकाव इसलिए बढ़ा कि वे अब तक की जातिगत पॉलिटिक्स से उब चु​के थे। भारत की जनता नागरिक के तौर पर अब अपना अधिकार मांग रही है, उसे रोजगार, सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा व सम्मान चाहिए। वे खुद को जाति में बंटना पसंद नहीं कर रही है। किसी राजनीति जाति के वोट बैंक की तरह खुद देखना पसंद नहीं करना चाहती है। सच में यह बदलाव बहुत बड़ी है लेकिन अफसोस

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वह तंत्र, मैं लोकतंत्र

कविता ​अभिषेक कांत पाण्डेय भड्डरी कमाल की बात है सत्ता वंश में है वंश बनाम लोकतंत्र वंश को एक प्रसिद्धि चाहिए। वंश कहता बन जाओ सिपाही बगावत करो मेरे लिए सूझ बूझ का बाण पैनी समझ की तीर छोड़ता वह जानता जनता नहीं कहेगी सिंघासन खाली करो। उसी ने तो बैठाया है वंश के वेश में मैं कहीं कोई जोगी तो कहीं कोई लड़का, कोई वंश हुकूमत का सीख रहा ककहरा। उसी धरती का किसान जोत रहा है नये खेत खाद पानी से सीचेगा नये बीज डालेगा बीजपत्र से निकलेगा एक नई चेतना। वह जवाब होगी उस राजमहल के अंदर चल रही सूझ बूझ का जो लोकतंत्र को बदल दिया है वंश की बेल में, जिसकी शाखाएं उलझी जनता के मन में। जनता इस उलझन में नहीं वो तो एक लोहार की तरह बना रहा है नया औजार भरोसे की पॉलिस से मांजकर न लगने वाले जंग से खराब होने वाले इस तंत्र में एक मरम्मत करेगा। बस एक बार इसलिए उस सूझ बूझ को जो सत्ता दीवारों और उन परिवारों के बीच खेली जाती है इतिहास से अब तक। वहीं इसी बीच उन सरकारी रिपोर्टों पर प्रहार है जो वादे में, जो परिवार से लिखती है बनावटी स्क्रिप्ट जनता को समझाती है ​फिर लोकतंत्र मे