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कविता क्या होती है

कविता क्या होती है मुख्यधारा की कविता के अलावा बची खुची खुरचन कविताएं  भी हैं,  जो साहित्य का हिस्सा हो सकती है पर आलोचक की नजर नहीें पडती है, यही है पीडि़त,  छटपटाती, बाहर से जर्जर लेकिन अंदर से मजबूत कविताएं, उनकी या उनके लिए जो मजबूर है,  पिछड़ा है , बिछडा है,  असुर है, असुरक्षित है । कविता तो एडिशन के उस बल्ब के अविष्कार की तरह है, जो 1000 प्रयोगों के बाद सफल हुआ। मन से मन और संवेदना के जन्म के बीच शब्दों की सूची मैं बैठी कई अनगिनत कविताएं जन्म लेती है और खत्म होती जाती है। हजार जन्म-मरण के पश्चात;  कविता कालजयी एडिशन रोशनी वाले बल्ब की तरह जन्म लेती है। कविता के एक-एक शब्द का वजन और उसका प्रभाव सोच समझ के रखा जाता है या दिल से उतनी ही वजन के शब्दों में लिखी कविता का जन्म होता है।  लिखने का तरीका आपका लेकिन बयानबाजी, नारा, विज्ञापन कविता नहीं होती है। रोचक जानकारी लखनऊ की भूलभुलैया के बारे में पढ़ें आखिर क्यों बनाया गया भूलभुलैया उसके पीछे के राज   जानने के लिए पढ़ें 11 लक्षणों से स्मार्ट बच्चों को पहचानें Tips: तनाव से हो जाइए टेंशन फ्री नई पहल  नए भारत की तस्वीर,

अब मैं कहूं

            अब मैं कहूं ? कुछ भी कहूं न अब क्यों? पीडा मन में लिए रिसता  रहूं पहाडों से, तब भी कुछ नहीं कहूँ। जब तडपता रहूं रेत में तपता रहूं तो क्यों न कहूं? जिस संसार में तुम हो उसका मैं हिस्सा हूं। आंखों में मैं आंसू बनूं और तुम हंसते रहो तब भी मैं कुछ न कहूं। दुनिया न जान ले तब, क्या ये मर्यादा मैं ही ढोऊं आखिर कब तक न कहूं। परछाई सी होती  जिंदगी जिंदगी को क्यों ढोऊं? आखिर कब तक यूं, उडता रहे मजाक। अब मैं कहूं? (सर्वाधिकार सुरक्षित) अभिषेक कांत पाण्डेय

प्लाट

कविता प्लाट कुछ दिन बाद यहां  बन जाएंगे मकान-दुकान फिर बिकेगा ईमान जब होगी बरसात तो गंगा खोजेगी अपनी जगह नहीं मिलेगा उसका वह जमीन  क्योंकि उस पर बन चुके होंगे मकान आखिर थक हार कर वह बहेगी शहरों-नालो से होकर दुकानों, मकानों में फिर कोसा जाएगा प्रकृति को दिया जाएगा नाम बाढ़ बाढ़ बाढ़ बाढ़़। अभिषेक कांत पांडेय

समानांतर हिंदी कविता-श्रीरंग

सन 80 के बाद की दलित आदिवासी एवं स्त्री कविता के विशेष संदर्भ में श्रीरंग की ताजा आलोचना पुस्तक समानांतर हिंदी कविता, वास्तव में 80 के बाद की वास्तविक कविता की प्रकृति को प्रकट करती है एक आलोचक के तौर पर श्रीरंग कि यह आलोचनात्मक दृष्टि बिल्कुल पैन है क्योंकि जिस तरह एक समय आधुनिकता के प्रत्यय को साहित्य के क्षेत्र में इतना ज्यादा खींचा गया था कि उसकी व्याप्ति की सीमा का प्रश्न उठाया जाना जरूरी हो गया था। उसी तरह बाद में समकालीनता की परिधि को कितना बढ़ाया जाए यह सवाल आलोचकों के लिए एक समस्या बन कर उपस्थित हो गया अर्थात जिस तरह आधुनिकता की परिधि में बहुत दूर तक रचनात्मक प्रयासों को समेटना संदिग्ध हो उठा। उसी तरह समकालीनता के दायरे में भी नई काव्य प्रवृतियों को रेखांकित करना एक  घिरी पाटी बात हो गई। दलितों और आदिवासियों स्त्री अस्मिता की अभिव्यक्ति इतनी सशक्त रूप में होने लगी कि उन्हें केवल समकालीन प्रवृत्ति के नाम पर चिन्हित कर पाना संभव नहीं रह गया।  श्रीरंग की आलोचना का दायरा इन कविताओं के परिपेक्ष में समकालीन कविताओं से किस तरह से और कैसे अपना नया मुकाम बना रही है यह समझना और समझा