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हुकूमत की धूप

किताबों में कैद गुजरा वक्त बेइंतहा ले रहा है। कुछ कतरन यूं हवा से बातें कर रहें बीतने से पहले पढ़ा देना चाहते हैं हवा को भी मेरे खिलाफ बहका देना चाहते इस मिट्टी की मिठास पानी के साथ मेरी खुशबू बता देना चाहती है। बे परवाह है इस हुकूमत की धूप अमीरों के घर पनाह लेती है। झोपड़ी का चिराग खेतों तक रौशनी फैला देती है भटके भ्रमजाल में राहगीर रास्तें में संभाल लेती है। रौशनी अंधेरे को चीरती बगावत की लौ जला देती है। अभिषेक कांत पाण्डेय

झोपड़ी

झोपड़ी कहां है घर किस नगर में है यह घर कहां महल की रोशनी आबाद है। घर यहां है घर नहीं महलों में सने खून की बूंदें। हर ईंट में झोपड़ी की मेंहनत। बीमार झोपड़ी बीमार सरकारी अस्पताल बीमार है तंत्र झोपड़ी में खाना झोपड़ी की आवाज नहीं सुनी सुनसान झोपड़ी पड़ी अभी अभी परिंदा उड़ चुका है।

झोपड़ी

झोपड़ी कहां है घर किस नगर में है यह घर कहां महल की रोशनी आबाद है। घर यहां है घर नहीं महलों में सने खून की बूंदें। हर ईंट में झोपड़ी की मेंहनत। बीमार झोपड़ी बीमार सरकारी अस्पताल बीमार है तंत्र झोपड़ी में खाना झोपड़ी की आवाज नहीं सुनी सुनसान झोपड़ी पड़ी अभी अभी परिंदा उड़ चुका है।

तू दीप बन

तिमिर घना  बन दीप  उ ज्ज्वल सा मन मन का दीप। सोच नया सच नया माटी के दीप। चहू प्रकाश बन धन से मन से तू देश बन चमक मन धरा का कर्ज तू दीप बन प्रकाश बन बिन सूरज के चमक चांद से भी धवल  तू बन  बन तू शिक्षा का दीप फैला उजाला  ज्ञान बन तू दीप बन  भविष्य बन हर जीवन का।
सपनों से सोना खोजा जा रहा है। सरकार के नुमाईंदे भी सपने के आधार पर खजाना पाने की सोच रहे वाकय यह सब इंडिया में ही हो सकता है। साधू के सपने के आधार पर पुरातत्व विभाग ने जांच की तो पाया की वहां अचुम्बकीय को धातु है शायद सोना ही हो, ऐसी पुरातत्विक खनन कई बार पुरातत्व विभाग ने की है लेकिन इतनी पब्लिसिटी शायद ही मिली है। मीडिया कहती है कि सपने के आधार पर मंत्री का बयान के कारण ही अचंभे वाली बात को कवरेज दिया जा रहा है तो पुरातत्व विभाग जांच के बाद किसी तरह की धातु होने के कारण खुदाई कर रही है सपने के कारण नहीं। बात तो हम लोगों को समझ में आ रही है कि किस तरह अंधविश्वास को दूर करने के लिए सरकार करोड़ों रूपये की योजना चलाती हैं और शिक्षा विज्ञान की जागरूकता का कार्यक्रम चलाती है जबकि सरकार यहां पर स्वयं अंधविश्वास फैला रही है। सब कहीं धर्म की तरफ ध्यान हटाकर वोट बैंक की राजनीति तो उत्तर प्रदेश में तो नहीं हो रही है। हमारे आस्था और धर्म के साथ कई कथित संत वैसे भी खेल चुके हैं और सभी पार्टियां धर्म के नाम पर फिर हमें गुमराह कर रहे है। पश्चिम हम पर हंस रहा है और हमारा विज्ञान,अध्यात्म और संस्कृ

मेरी नींद और मेरा सपना किसने छीना

मेरी नींद और मेरा सपना किसने छीना दो साल से लंबित टीईटी के अंक से भर्ती प्रक्रिया को लेकर नाटक ही नाटक हो रहा है। मामला कोर्ट में लेकिन सुनवाई अभी तक अंजाम में नहीं पहुंची है। लगता है जब तक फैसला आएगा तब तक एक पीढ़ी बीत चुकी होगी और देर से मिला न्याय यह होगा कि इन्हें पेंशन दे दी जाए क्योंकि इनकी तो अब रिटायरमेंट की उम्र हो गई है। 50 साल तक में तो न्याय मिल ही जाएगा क्यों भाई मैंने सही कहा ना,,,,कल मैंने सपने में देखा था जांच करा लिजिए बात बिल्कुल सही होगी सपने में एक संत ने भी यही देखा और मुझसे बताया था। यह इंडिया है यहां हकीकत रूपी गरीबी बेरोजगारी और स्विस बैंक में दबा हमारा सोना लाने की बात कोई मंत्री सरकार नहीं कहती है। सपने के बात पर सब कुछ हो जाता है। वाह भाई क्या बात है अब मैं उन लोगों को क्या बताउं जो मम्मी कहने पर इंडिया के भूख का एहसास होता है। आधे पेट खाकर ​जीने वाले करोड़ो भूखे भारतियों को रात में नींद नहीं आता है कितने बरोजगारो को सरकार की गलत नीतियों से बेरोजगारी का दंश झेल रहे लोगों को नींद कहां से आएगा नहीं तो हमभी सोते होते तो बता देते इस सरकार को की मेरे सपने में इस

हिंदी दिवस की याद में व्यंग्य लेख अभिषेक कांत पाण्डेय

हिंदी दिवस की याद में                                 व्यंग्य लेख   अभिषेक कांत पाण्डेय   हिंदी दिवस 14 सितंबर आने वाला है। कुछ पहले ही लिखने का मन कर रहा सो लिख रहा हूं। अच्छी लगे तो क्लैपिंग कर लीजिएगा। खैर बात शुरू की जाए कहां से यहीं से की भारत की राष्ट्रभाषा क्या है? सीधा जवाब हिंदी। लेकिन कैसे क्या वास्तव में हम अंग्रेजी के आगे हिंदी को संपर्क भाषा मानते हैं? क्या हिंदी सरकारी कार्यालय में खासतौर पर केंद्रीय कार्यालय में राजकाज की भाषा का दर्जा या अनिवार्यता है, नहीं क्योंकि अंग्रेजी प्रेम और हिंदी न सीखने का एक खास वर्ग द्वारा हिंदी हाशिये पर रखी जा रही है। क्या हिंदी सचमुच में पूरे इंडिया में व्यावहारिक रूप से अपनाई जा रही है। बात फिर घूम रही है क्या हिंदी बोलकर, लिखकर, पढ़कर कम अंग्रेजी जानने वालों के बराबर पैसा कमाया जा सकता है? आप जानते हैं कि हिंदी में सिनेमा उद्योग अरबों कमा रहा है क्या वहां हिंदी की लिपी का लोप नहीं हो रहा देवनागरी गायब नहीं हो रहीं है। रोमन में स्क्रिप्ट को हिंदी बोली में बोलकर एक्टिंग करने वाले करोड़ों कमा रहे हैं जबकि हिंदी साहित्यकर्मी व लेखक अदद पुर

हमारी शिक्षा नीति में सुधार की जरूरत

अभिषेक कांत पाण्डेय हमारी शिक्षा नीति में सुधार की जरूरत                      आ जकल अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा का चलन तेजी से बढ़ रहा है। इधर कान्वेंट और पब्लिक स्कूल के नाम पर तेजी से प्राइवेट स्कूल खुल रहे हैं जहीर है कि हिंदी मीडियम स्कूल में शिक्षा का गिरता स्तर इसके लिए जिम्मेदार है वहीं सरकार की ढुलमुल नीति इसके लिए सबसे अधिक दोषी है। हिं दी भाषी राज्यों में अंग्रेजी माध्यम के पब्लिक स्कूल की बाढ़ है। कुछ गिनती के अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों को छोड़ दे तो बाकी सभी स्कूल में आंग्रेजी माध्यम में पढ़ने वाले ऐसे छात्र कक्षा आठ तक उनका ज्ञान सीमित ही रह जाता है कारण, अंग्रेजी माध्यम की किताबें स्व:अध्ययन में बाधा उत्पन्न करती है। रिसर्च भी बताते हैं कि प्राईमरी स्तर में अपनी मातृभाषा में पढ़ने से बच्चे बहुत जल्दी सीखते हैं। यही कारण है कि हिंदी भाषा या जिनकी मातृभाषा है वह अंग्रेजी माध्यम के छात्रों के मुकाबले में तेजी से अपने वातारण से सीखते हैं इसमें सहायक उनकी मातृभाषा के शब्द होते हैं जो उनके शुरूआती दौर में सीखने की क्षमता में तेजी से विकास करता है। यहां इस बात का  अफसोस है कि
अभिषेक कांत पाण्डेय हमारी शिक्षा नीति में सुधार की जरूरत                      अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा जरूरत कम जुनून ज्यादा है अंग्रजी माध्यम बनाम हिंदी माध्यम आ जकल अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा का चलन तेजी से बढ़ रहा है। इधर कान्वेंट और पब्लिक स्कूल के नाम पर तेजी से प्राइवेट स्कूल खुल रहे हैं जहीर है कि हिंदी मीडियम स्कूल में शिक्षा का गिरता स्तर इसके लिए जिम्मेदार है वहीं सरकार की ढुलमुल नीति इसके लिए सबसे अधिक दोषी है। हिंदी भाषी राज्यों में अंग्रेजी माध्यम के पब्लिक स्कूल की बाढ़ है। कुछ गिनती के अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों को छोड़ दे तो बाकी सभी स्कूल में आंग्रेजी माध्यम में पढ़ने वाले ऐसे छात्र कक्षा आठ तक उनका ज्ञान सीमित ही रह जाता है कारण, अंग्रेजी माध्यम की किताबें स्व:अध्ययन में बाधा उत्पन्न करती है। रिसर्च भी बताते हैं कि प्राईमरी स्तर में अपनी मातृभाषा में पढ़ने से बच्चे बहुत जल्दी सीखते हैं। यही कारण है कि हिंदी भाषा या जिनकी मातृभाषा है वह अंग्रेजी माध्यम के छात्रों के मुकाबले में तेजी से अपने वातारण से सीखते हैं इसमें सहायक उनकी मातृभाषा के शब्द होते हैं
अभिषेक कांत पाण्डेय  5 सितंबर शिक्षक दिवस पर विशेष सामग्री                 गुरू के बिन ज्ञान कहां कोई भी व्यक्ति बिना गुरू के अधूरा है। महाभारत के युद्ध में विचलित अर्जुन को श्रीकृष्ण ने गीता का ज्ञान दिया जिसके बाद अर्जुन ने सत्य का साथ दिया। इस तरह अर्जून के जीवन का अंधेरा गुरू के ज्ञान के प्रकाश से दूर हो गया और अर्जुन ने श्रीकृष्ण को गुरू के रूप में स्वीकार किया। हमारे देश की संस्कृति में गुरू और शिष्य परंपरा प्राचीनकाल से ही देखने को मिलती है। मनुष्य को सही राह गुरू ही दिखा सकता है, बिना गुरू के ज्ञान नहीं मिलता है। आज की स्कूली पद्धति में गुरू और शिष्य परंपरा लोप होती जा रही है। विद्या अर्जन जबसे व्यावसायिक हो गई है तब से हमने अपनी संस्कृति व परंपरा को पीछे छोड़ दिया है। पश्चिमी देशों में जिस तरह से स्कूल में छात्रों के द्वारा हिंसक घटनाएं देखने को मिलती हैं और वहीं हमारे देश में भी छात्रों और गुरूओं के कथित व्यवहार हमारे समाज में स्वीकृत नहीं है। भारतीय संस्कृति और परंपरा के विरूद्ध है। यह माना जाता है कि किसी देश का विकास उसके स्कूलों में होता है जहां विद्यार्थी ज्ञा

माटी के लाल की बातें

माटी के लाल की बातें कहां जाएं हम इस डगर में, इस शहर में सड़कें नहीं। मंजिल है मुसाफिर भी है, वो मुस्कान नहीं। वो यादें नहीं, वे तन्हाई नहीं,बिक गई वह मुस्कान यहीं। न जाने मेरी वो तन्हाईयां कहां, न जाने मेरी वो यादें कहां। ढूंढता हूं मैं उस उजड़े रास्तों में, धूमिल हो रही जिंदगी से पूछता हूं। कब तू तन्हाईयों को, मेरी यादों को ढूढ़ लाएगी। इस शहर में नहीं, इस सड़क में नहीं। जगमाती शहर की रोशनी मेरे इस गांव में ​कब आएगी। गांव की सड़क से कब हम शहर की सड़कों पर जाएंगे। हम हैं हमारे हिस्से जिंदगी, कब तक अपने स्वार्थ के लिए  कोई जिएगा। मंजिल है मुसाफिर भी है, वो दिन हम यूं ही गुजार देंगे। मेरा भारत है मेरा, कब हमें मिलेगा हमारे हिस्से की रोटी कब तक कोई कागज़ के पैसों से कमाएगा रकम मोटी। कब तक हम यूं हलों से हम जमीन पर बोते रहेंगे। कोई और कब तक हमारी जिंदगी के हिस्से बांटते रहेंगे। सूनी कालाई, जिसने गंवाई सीमा के पार अपने माटी के लाल। और कब होगी दिल्ली में इस गांव की कदर। कब तक कोयले में जलेगा हिंदुस्तान।                                                               अभिषे

श्री कृष्ण होने के मायने

                                                             श्री कृष्ण होने के मायने श्री कृष्ण शब्द हमारे जन चेतना का हिस्सा है। जन्माष्टमी का त्योहार हमें जीवन के विभिन्न पहलुओं से परिचित कराती है जिसमें श्रीकृष्ण ने हमारे लिए जीवन का मार्ग दिखाया।  माखन चोर श्रीकृष्ण का बाल रूप उनका नटखटपन, यशोदा माता के सामने भोलेपन से कहना-मइया मोरी मय माखन नहीं खायो। वहीं गोपियों के संग श्रीकृष्ण की रासलीला हमारे जीवन में जीवंतता का रस घोलती है।  एक बार श्रीकृष्ण मथुरा में महल के प्रांगण में टहल रहे थे तभी उनका मित्र उद्धव उनके पास आया और बृजधाम का हाल चाल जानने के लिए श्रीकृष्ण ने पूछा। हे उद्धव! मुझे बृज के बारे में बताओं कैसा है मेरा गोकुल तुम तो वहां से लौटे हो।  यमुना के सुंदर तट के वृक्षों की ठण्डी छाया, गोपियों की कोलाहाल, सखी-बंधु कैसे है सब, उनका हाल बताओ। उद्धव -  हे! श्रीकृष्ण जैसे ही मैंने वहां आपका संदेशा सुनाया। गोपियां बेसुध हो गईं। बृज के सभी पशु-पक्षी पेड़, खेत बस तुम्हारी ही राह तक रहे हैं। जल्दी वहां जाओ यमुना के तीर, बाल- गोपाल, सखी गोपियां सभी तुम्हारी राह तक रहे हैं

मेरा शहर कूड़े में तब्दील

मेरा शहर कूड़े में तब्दील      http://prakharchetna.blogspot.in/  इलाहाबाद। शहर सभ्यता के प्रतीक हैं। सिंधु घाटी की सभ्यता शहरी थी। चारों ओर पक्की नालियां पक्के मकान, कूड़े फेंकने का उचित प्रबंध था लेकिन आज मेरा श​हर कूड़े खाने और कचरे में तब्दील हो रहा है। जगह—जगह​ बेतरकीब कूड़े का अंबार बदबू करता आपकों मिल जाएगा। उत्तर प्रदेश का इलाहाबाद जिले का यही हाल है जगह—जगह ​कूड़े करकट पड़ा हुआ है। लोगों की जिम्मेदारी अपने घरों को साफ रखना है यही कारण है कि पार्क, गली में वे बड़े इत्मनान के साथ कूड़ा फेंक अपने दायित्व की इतिश्री कर लेते हैं। इस तरह एक अच्छे शहरी होने का धर्म निभाते हैं। हमारा घर साफ रहे भले गली मुहल्ला, कूड़े के इधर—उधर फेंकने से गंदा दिखे, कोई फर्क नहीं पड़ता है। इन दिनों बारिश का मौसम है और नगर निगम की दया से पड़े कूड़े बदबू और बीमारियां बांट रहे हैं। राजापुर के पीछे ऐतिहासिक कब्रिस्तान के पास तो कूड़ा जानबूझकर डम्प किया गया। वहीं पानी टंकी से सुलेम सराय के बीच खाली पड़े जगह पर तो गड्ढे पाटने के नाम पर कूड़े की कुरबानी दी गई है। यहां से गुजरने वाला रूमाल को मुंह और नाक प

प्याज कहे एक कहानी

प्याज कहे एक कहानी जहां प्याज लोगों को रूला रहा है। वहीं प्याज के बढ़ते दाम से व्यापारी लाखों कमा रहे हैं। गरमियों में नासिक की प्याज की औकात थोक में 8 से 10 रूपये थी। मुनाफाखोरी और गैर तरीके से ​थोक व्यापरियों ने जमकर प्याज का स्टोर शुरू किया। इधर प्याज की कम पैदावार के साथ आयात और निर्यात की सही नीति न होने के कारण घरेलू प्याज की कीमत बढ़ना शुरू हो गया। ऐसे में व्यापारियों को जबरजस्त मुनाफा हो रहा है। जहां किसान अपनी पैदावार को पहले ही कम दामों में प्याज बेच चुके हैं ऐसे मे सारा फायदा सीधे—सीधे बड़े व्यापरियों को हो रहा है। इसी बहाने सियासत गर्म हो रहा है, प्याज कभी बीजेपी सरकार की सत्ता पल्ट दी थी आज बिल्कुल उसी तरह हाल है कांग्रेस की सरकार है और प्याज दिल्ली में 80 रूपये किलों बिक रहा है। ऐसे में प्याज में राजनीति गरम हो रही है भले आम भारतियों के थाली में प्याज गायब है। वहीं पांच रूपये में भरपेट भोजन कराने वाले नेता कुछ बोल नहीं रहे हैं। आज तो यह है कि​ प्याज खरीदने में उपभोक्ता के आंसू निकल रहा है। प्याज आज स्टेटस सिंबल बन गया है। एक खबर के मुताबिक प्याज बेचकर एक व्यापारी

आजादी में हम

आजादी में हम आजादी के 66 साल बाद भी हम आज विकास कर रहे हैं। विकास में हम आज भी गरीबी की परिभाषा केवल जीने से भी बत्तर कर पा रहे हैं। गरीबी, अशिक्षा और खराब सड़कें सबकी हालत राजनैतिक भ्रष्टाचार ने कर दी है। हम लगातार लोकतंत्र को सशक्त बना रहे हैं।  वहीं राजनीतिक जमात आरोप—प्रत्यारोप की  ओछी राजनीति  में मशगूल है। हमारा भारत अब कुछ अमीरों के हाथों में है। गरीब केवल मतदाता है उसे सपने देखने का हक है और उनके सपनों को छिनने का हक उन लोगों का है जो सता के नशे में चूर है। इन सबके बावजूद भारत तरक्की कर रहा है।  हम अब तरक्की के लिए छोटे राज्यों में बटने लगे है और इसमें विकास कम राजनीतिक मंशा ज्यादा है। हमारी आजादी के इतने साल के बाद भी हम भारतीय है ये हमारी पहचान होनी चाहिए लेकिन नेता अब वोट बैंक के लिए हमें जातियों में बांट चुकी है। हम धर्मों में बंट रहे है जबकि हम एक देश के निवासी है। भारतीयता ही हमारी पहचान है।  राजनीति में जो युवा शीर्ष में है उनसे भी कुछ अलग करने की अपेक्षा  नही कर सकते हैं वे विरासत से आए हैं और पुराने विचारों से ही राजनीति करेंगे। समझिये कि विरासत की सत्ता उनके पास है और

मुसीबत की चाभी सच्चा दोस्त

हमें उम्र के पड़ाव में एक ऐसे इंसान की जरूरत होती है जो हमारे सुख दुख को समझे उसे ही दोस्त कहते हैं। श्रीकृष्ण ने ​सुदामा से अपनी मित्रता निभाई। अमीर—गरीब, जाति व धर्म के बंधन से परे है दोस्ती। इस दुनिया में भीड़ होने के बाद भी आप अकेला हैं, आपके पास सब कुछ हो रूपया—पैसा,बैंक बैलेंस, मां, बाप, पत्नी, बच्चे हैं लेकिन एक सच्चा दोस्त नहीं तो आपकी जिंदगी जिम्मेदारियों के तले खत्म पत्नी की फरमाईश और बच्चें की जिद में ही जिंदगी दफन। दोस्त तो दोस्ती सांय  पांच बजे से दुनियादारी की सीख दोस्त से मिलती है और जादूई पिटारे की तरह आपका दोस्त आपकी मुसीबत का हल भी निकाल लेता है। घर में कोई कार्यक्रम है, शादी, पार्टी, बेचारा दोस्त ही पूरी विश्वसनीयता के साथ लगा रहेगा। वहीं आपके रिश्तेदार तो बस एकही फिराक में कहीं से कमी हो और बना दे तिल का ताड़। अपना दोस्त इन सब चीज़ों से बचाता आपकी नाक भी बचा लेता है। दोस्त हर मुसीबत की चाभी है।  दोस्त के खाल में चमचों से बचकर रहना चाहिए तिल के ताड़ पर चढ़ा देते हैं। कथाक​थित दोस्त की भूमिका में कहलाने वाले असल में ये चमचे होते हैं जो आपसे अपना उल्लू सीधा करते

संविदा शिक्षक की परेशानी और हल किस्तों में मिला

प्रखर चेतना। मध्यप्रदेश। संविदा शिक्षक की परेशानी और हल किस्तों में मिला। सरकार से उम्मीद लगाए बैठे संविदा शिक्षकों की झोली में समान कार्य के लिए समान वेतन किस्त में मिलेंगे। संविदा शिक्षक की मांग यह भी है कि नई स्थनांतरण नीति लागू होनी चाहिए लेकिन सरकार इस मसले पर कोई फैसला अभी तक नहीं लिया। मंहगाई में घर चलाना मुश्किल है। अब संविदा शिक्षक आंदोलन के मूड में है। वही मध्यप्रदेश में कई सर्वे फिर से बीजेपी को कमान संभालने वाली बता रही है। ऐसे में असंतुष्ट शिक्षक कहीं बाजी पलट न दें। सरकार को कोई ठोस कदम उठाना होगा नहीं तो परिणाम बदलते देर नहीं लगेगी। संविदा शिक्षकों का कहना है कि हम कई सालों से इंतजार कर रहे हैं ऐसे में सरकार की नीति हमारे प्रति स्पष्ट नहीं है और हम आंदोलन करने के लिए बाध्य हैं। देखा जाए तो सूबे में संविदा शिक्षक नियमित शिक्षक के बराबर कार्य करते है लेकिन वेतन व सुविधाओं के मामले में इनके सा​थ दोयम दर्जे की नीति बनाई जा रही है। ​आरटीआई कानून लागू होने के बाद शिक्षकों को वेतन भत्ते में परिवर्तन करना जरूरी है। वहीं देखा जाए तो छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, ​हरियाणा ज

अभी हम तरूणाई है

अभी हम तरूणाई है अभी मंहगाई है अभी भ्रष्टाचार है अभी चुनाव है अभी वादें हैं अभी हम खोखले नहीं अभी हम खेल भी नहीं अभी हम तरूणाई हैं अभी हम कुछ नहीं कल हम है कल हमारा है कल हम वोट डालेंगे कल हम फिजा बदेलेंगे हम लोकतंत्र बनेंगे।

चलो धरा में हरियाली रचे

चलो धरा में हरियाली रचे कविता अभिषेक कांत पाण्डेय चलो धरा में हरियाली रचे गगन को न्योता पंक्षियों को बनाये देवता संदेश दे हरियाली की सपने में हरा भरा दिखे गगन से धरा पंक्षी तू देख जंगल कितना बता फिर लगा दूं कई वृक्ष बैठ जाना कहीं दु​निया तेरी भी। पहाड़ मत हो गंभीर धीरे बहने दे नीर ​हरियाली सौंप दूंगा अब नहीं करना हलचल हमने भेजा है संदेश चिड़ियों का यह देश मानव सीख रहा आदिमानव से ​हरी डालियों से तेरे देह से।

कोयल कूंकेगी अब हर डाली

कोयल कूंकेगी अब हर डाली पतझड़ आया पेड़ों के पत्ते झड़ते नया प्रभात, नया जीवन संचार रचते उदास बैठे कोयल को आस तेज पवन के झोंकों के बाद फिर नव संचार बसेगा वृक्ष बदलेंगे अपने गहने फिर आएंगी जंगल की हरियाली। नये पत्ते, नई उमंग के साथ करेंगे वसूंधर का श्रृंगार हवा के साथ खनक रहें सूखे पत्ते मिल जाना चाहते हैं मिट्टी में बनकर वो खाद फिर बनेंगे वृक्ष की हरियाली। जीवन चलता, बदलता हर पल फिर नये कलेवर में नई हरियाली पात—पात डालियों से गिर कर अपना जीवन नेवछावर करना सीखाती सीख यही बड़ी सबसे जो आया जाना उसे धरा का चक्र यही हर पतझड़ के बाद हरियाली कोयल कूंकेगी अब हर डाली

संविदा शिक्षक की मांग ​समान कार्य के लिए दे समान वेतन: समान कार्य समान वेतन

संविदा शिक्षक की मांग ​समान कार्य के लिए दे समान वेतन: समान कार्य समान वेतन अभिषेक कांत पाण्डेय। भोपाल। ​सभी बच्चों को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा कानून लागू होने के चार साल के बाद भी मध्यप्रदेश की सरकार गुणवत्ता वाली शिक्षा दे नहीं पा रही है। अभी भी शिक्षकों की भर्ती संविदा में की जाती है। शिक्षाकार्य करने वाले संविदा शिक्षकों का वेतन प्राईवेट स्कूलों से भी कम है। स्थाई नौकरी, समानकार्य, समान वेतन और सम्मान के लिए संविदा शिक्षक सड़कों पर भी उतर चुके हैं। इसके बावजूद भी संविदा शिक्षकों की सरकार नहीं सुन रही है। जबकि प्रदेश सहित सारे देश में एक से लेकर कक्षा आठ तक निशुल्क और अनिवार्य ​शिक्षा कानून लागू हो चुका है लेकिन शिक्षकों को अभी भी उचित वेतन नहीं दिया जा रहा है। संविदा शिक्षकों का कहना है​ कि कम वेतन की वजह से जीविकोपार्जन कर पाना कठिन हो रहा। सरकारी शिक्षकों के बराबर काम व योग्यता होने के बावजूद भी इन्हें कम वेतन पर काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। वहीं आरटीआई लागू होने के बाद कम वेतन में शिक्षण कार्य कराना इस कानून में गुणवत्तयुक्त शिक्षा की बात बेईमानी साबित हो रही है। स्
सृजनात्मक  लेखन बच्चों में आभव्यक्ति का विकास करती है। कहानी, कविता व लेख लेखन से बच्चे अपने आसपास की  विषय वस्तु, घटनाक्रम व विश्लेषण की अदृभुत श्रमता का विकास करते हैं। बच्चों दृवारा लिखित कहानी, कविता व लेख  आदि से उनकी समझ का विकास और दुनिया के साथ स्थानीय परिवेश को देखने की झमता की अभिवृद्धि् होती है। इस  श्रृंखला में बच्चों से मौलिक लेखन के लिए प्रेरित करना और उनके लिखे लेखों को प्रकाशित कराना उनके सृजनात्मक  कल्पना शक्ति को निखारना शिक्षा का एक अनिवार्य भाग है। कक्षा 1 से लेकर 12 तक के विद्यार्थी अपनी मौलिक रचना कहानी, लेख्र, कविता,यात्रा वृतांत भ्रेजे मेल  abhishekkantpandey@gmail.com

संविद शिक्षक भर्ती में हाईकोर्ट ने दिए स्पष्ट आदेश, फिर भी अफसर कन्फ्यूज क्यों हैं

संविद शिक्षक भर्ती में हाईकोर्ट ने दिए स्पष्ट आदेश, फिर भी अफसर कन्फ्यूज क्यों हैं अभिषेक कांत पाण्डेय/भोपाल। सभी के लिए अनिवार्य एवं निशुल्क शिक्षा कानून के तहत 14 साल तक के बच्चों को गुणवत्ता युक्त शिक्षा देना राज्य का परम कर्तव्य है। लेकिन आरटीई एक्ट का पालन राज्य सरकार करने मे लचीला रवैया अपना रहे हैं। जिसके चलते गुणवत्ता युक्त शिक्षा की बात बेईमानी साबित हो रही है। वहीं संविदा शाला वर्ग दो में बीए में सामान्य वर्ग के उन आवेदकों को जिन्होंने बीएड में 22 अगस्त 2010 तक प्रवेश लेकर 2011 तक बीएड उतीर्ण किया है उन्हे 50 प्रतिशत की बाध्यता नहीं है क्योंकि आरटीई एक्ट पात्रता 23 अगस्त 2010 में लागू हुआ है। इसीलिए वर्ग 3 के लिए जबलपुर हाईकोर्ट के फैसले में भी 50 प्रतिशत की बाध्यता को समाप्त कर दिया गया है। वहीं इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले में मनीष सिंह के याचिका में हाईकोर्ट ने परास्नातक 50 प्रतिशत के आधार पर बीएड करने वाले को बीए में कोई अंकों की बध्यता नहीं है यह बात एनसीटीई के वकील में ने भी हाईकोर्ट के सामने स्वीकार किया। लेकिन नियमों की उपापोह में संविदा शाला भर्ती में अचानक

मानव बनों

मानव बनों हम जाग गए सवेरा हो गया कल रात का मंजर अभी भी है सुनसान चीखें बहती पानी के साथ आवाजें जिंदा शब्द हिलना डुलना में तब्दील गड़गड़हाट ध्यान से सुन सैलाब नहीं अब हेलीकाप्टर उम्मीद खोने के बाद जागने की हालात देश में देव भूमि से बत्तर बच्चे ने बताया हम कट रहे काट रहे पेड़। दिल्ली से देवभूमि लाओं उनकों बताओ प्र​कृति क्या है             अभिषेक कांत पाण्डेय

संविदा शाला वर्ग 2 व 3 में 50 प्रतिशत से कम अंक वाले हजारों बेरोजगारों के साथ अन्याय हो रहा है।

संविदा शाला वर्ग 2 व 3 में 50 प्रतिशत से कम अंक वाले हजारों बेरोजगारों के साथ अन्याय हो रहा है। अभिषेक कांत पाण्डेय/मध्य प्रदेश में व्यापम परीक्षा उतीर्ण योग्य ऐसे बेरोजगारों जिन्होंने बीए व डीएड की डिग्री एनसीटीई के नियमानुसार प्राप्त की लेकिन उन्हें नौकरी इसलिए नहीं दी जा रही है कि उनका पिछली परीक्षा स्नातक या इंटर में 50 प्रतिशत से कम अंक है। इस कारण से ऐसे हजारों योग्य उमीद्वारों को बाहर कर दिया वहीं व्यापम परीक्षा में अनुतीर्ण अतिथि शिक्षकों के हवाले माडल स्कूल सौंप दिया गया है। सरकार की अदूरदर्शिता के चलते व्यापम परीक्षा उतीर्ण बीएड व डीएड डिग्री धारक सड़कों पर आंदोलन करने के लिए बाध्य हो गये हैं। संविदा शाला वर्ग 1 व 2 हजारों सीटें रिक्त है। जबकि 14 जून 2013 को हाईकोर्ट जबलपुर का एक फैसले में 50 प्रतिशत की बाध्यता को निरस्त कर दिया गया वहीं सरकार को चार हप्ते में शीध्र भर्ती करने को आदेश भी दिया गया है। इसके बावजूद व्यापम परीक्षा में अनुतीर्ण कुछ अतिथि शिक्षक को माडल स्कूल  में पढ़ाने का दायित्व सौंपा गया है। जबकि प्रदेश में हजारों योग्या व्यापम परीक्षा उतीर्ण बीएड एवं डीएड य

उपेछित संगम नई कविता

उपेछित संगम            नई कविता                  अभिषेक कान्त पाण्डेय  संगम की रेती  रेत के ऊपर गंगा  दौड़ती, यहाँ थकती गंगा  अभी-अभी बीता महाकुम्भ  सब कुछ पहले जैसा  सुनसान बेसुध। टिमटिमाते तारें तले बहती, काली होती गंगा बूढी होती  यमुना। महाकुम्भ गया  नहीं हो हल्ला  भुला दिया गया संगम। एक संन्यासी  एक छप्पर बचा  फैला मीलों तक सन्नाटा  सिकुड़ गई संगम की चहल  नहीं कोई  सरकारी पहल है- चहल-पहल है- कानों में नहीं संगम  आस्था है  वादे भुला दिए गए  भूला कोई यहाँ, ढूँढ नहीं पाया  यहाँ था कोई  महाकुम्भ। सरपट सरपट बालू केवल  उपेछित अगले कुम्भ  तक। फिर जुटेगी भीड़  फिर होंगे वादे विश्व में बखाना जाएगा महामेला  अभी भी संगम की रेती में पैरों के निशान रेलवे स्टेशन की चीखातीं सीढियाँ  टूटे चप्पल के निशान  हुक्मरान ढूंढ़ रहें  आयोजन का  श्रेय। अब पर्यटक, पर्यटन और आस्था गुम  महाकुम्भ के बाद  यादें, यादें गायब वादे, वादे  धसती रेतीली धरा सिमटती प्रदूषण वाली गंगा। आने दो फिर  हम करेंगे अनशन  त्यौहार की तरह हर साल 

प्रेम-याद, भूल याद नई कविता

प्रेम-याद, भूल याद              नई कविता                       अभिषेक कान्त पाण्डेय  बार-बार की आदत  प्रेम में बदल गया  आदत ही आदत  कुछ पल सबकी  की नज़रों में चर्चित  मन   सभी की ओठों में वर्णित प्रेम की संज्ञा  अपने दायित्त्व की इतिश्री, लो बना दिया प्रेमी जोडा  बाज़ार में घूमो, पार्क में टहलों  हमने तुम दोनों की आँखों में पाया अधखिला प्रेम। हम समाज तुम्हारे मिलने की व्याख्या प्रेम में करते हैं  अवतरित कर दिया एक नया प्रेमी युगल। अब चेतावनी मेरी तरफ से  तुम्हारा प्रेम, तुमहरा नहीं  ये प्रेम बंधन है किसी का  अब मन की बात जान  याद  करों नदियों का लौटना  बारिश का ऊपर जाना  कोल्हू का बैल बन भूल जा, भूल था । जूठा प्रेम तेरा  सोच समझ  जमाना तैराता  परम्परा में  बना देती है प्रेमी जोड़ा  बंधन वाला प्रेम तोड़  बस बन जा पुरातत्व  अब बन जा वर्तमान आदमी  छोड़ चाँद देख रोटी  का टुकड़ा  फूल ले बना इत्र, बाज़ार में बेच  कमा खा, बचा काले होते चेहरे  प्रेम याद , याद भूल  देख सूरज, चाँद देख काम रोटी, टुकड़ा और ज़माना  भूला दे यादें

बदलना जारी

 बदलना जारी        नई कविता   अभिषेक कान्त पाण्डेय  बदलना जारी  मोबाइल रिंगटोन  आदमी  धरती मौसम  आकाश, सरकारी स्कूल  कुआँ उसका कम होता पानी  चौपाल  फैसला  रिश्ते  इंजेक्शन वाली लौकी और दूध  गरीबी गरीब  आस्था प्रसाद  प्रवचन भाषण  नेता अनेता  पत्थर गाँव का ढेला  ओरतें  कामयाबी  साथी एकतरफा प्यार  भीड़ हिंसक चेहरा  सूरज थकता नहीं  चूसता खून  बंजर मन  अवसाद मन  मधुमेह रक्तचाप  प्रकृति प्रेम कापी पन्नों  किताबों में स्रजन दूर  नीली धरती नील आर्मस्ट्राम की  रिंगटोन मोबाइल आदमी  बदलता समाज  पार्यावरण                                       अभिषेक कान्त पाण्डेय 

जूठे मन

कविता जूठे  मन कुछ हिस्सा जीवन बदरंग आदमी सोच कृत्य राजधानी लगातार बार बार जंगल में तब्दील सड़क से संसद। गलत गलत चश्मे वाली आखों से देसी वादे उतरे -नहीं हज़म सब ख़त्म खेल। पुराने मन में नयापन नहीं नहीं भ्रम समझ वही राजधानी जंगल सड़क से संसद चेहरे मोहरे बदरंग आदमी बहुरे छत, हत -प्रत बुझा मन वहीं चश्मे वाली नंगी ऑंखें लुटेरा सीधा-साधा करोडों खाली पेट तैरती दुगनी आंखे उठाते इतने सिर। कहीं अरबों की डकार बडा  थैला असरदार मुखिया टाले  नहीं हजारो घोटाले।                            अभिषेक कान्त पाण्डेय 

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लघु-कथा' CBSE BOARD CLASS 9 NEW SYLLABUS LAGHU KATHS LEKHAN

'लघु-कथा' CBSE BOARD CLASS 9 NEW SYLLABUS LAGHU KATHA LEKHAN  लघु और कथा शब्द से मिलकर बना हुआ है। लघु का अर्थ होता है- छोटा और कथा का अर्थ होता है-कहानी। Laghu Katha ke Udharan class 9th hindi term-2 sylabuss 2022 hindi  न्यू सिलेबस सीबीएसई बोर्ड लघु कथा लेखन क्लास नाइंथ इस तरह लघुकथा का अर्थ हुआ कि 'छोटी कहानी'। the shrot story छात्रों हिंदी साहित्य को दो भागों में बाँटा गया है, पहला गद्य साहित्य (gadya sahitya)  और दूसरा काव्य साहित्य ।  गद्य साहित्य के अंतर्गत कहानी, नाटक, उपन्यास, जीवनी, आत्मकथा विधाएँ आती हैं। इसी में लघु-कथा विधा भी 'गद्य साहित्य' का एक हिस्सा है। कहानी उपन्यास के बाद यह विधा सर्वाधिक प्रचलित भी है। लघुकथा की महत्वपूर्ण बातें the important character of laghu katha in Hindi लघु कथा क्यों लिखी जाती है? 1.आधुनिक समय में इंसानों के पास समय का अभाव होने लगा और वे कम समय में साहित्य पढ़ना चाहते थे तो  'लघु-कथा' का जन्म हुआ। लघु कथा का जन्म कैसे हुआ? हमारी संस्कृति में लघु कथा का क्या-क्या रूप है? laghu Katha kya hota hai? 2.लघु कथा

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भारतीय आजादी के गुमनाम नायक

भारतीय आजादी के गुमनाम नायक bhaarateey aajaadee ke gumanaam naayak 2022 आज हम अपनी मर्जी से कहीं भी आ जा सकते हैं, पढ़ लिख सकते हैं अपने मनपसंद का करियर चुन सकते हैं, क्योंकि हम आजाद हैं और इस आजादी के लिए वीरों ने अपनी आहुति दी है, पर जब स्वतंत्रता सेनानियों के नाम बताने की बारी आती है तो हम सिर्फ गिने-चुने नाम ही बता पाते हैं, जबकि हकीकत यह है कि आजादी सिर्फ कुछ लोगों के बलिदान से नहीं मिली बल्कि इसके लिए बहुतों ने अपनी जान गंवाई। इनमें से कई तो गुमनामी की अंधेरों में खो चुके हैं। हम आपको ऐसे ही स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में बता रहे हैं, जिन्होंने आज़ादी की लड़ाई में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी-  आजादी के गुमनाम नायक हम बताने जा रहे हैं आजादी के महानायक जिनको हम भूल गए हैं-- कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़ने वाले कन्हैयालाल कई बार अंग्रेजी शासन के खिलाफ आवाज उठाने के आरोप में गिरफ्तार किए गए और अंग्रेजों के जुल्म का शिकार हुए पर उन्होंने कभी हार नहीं मानी हर बार दुगनी ताकत के साथ अंग्रेजों से मुकाबला किया। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजा