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2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
अभिषेक कांत पांडेय हम पिजड़ों में  हम सब ने एक नेता चुन लिया। उसने कहा उड़ चलो। ये बहेलिया की चाल है, ये जाल लेकर एकता शक्ति है। हम सब चल दिये नेता के साथ नई आजादी की तरफ हम उड़ रहें जाल के साथ। आजादी और नेता दोनों पर विश्वास हम पहुंच चुके थे एक पेड़ के पास अब तक बहेलिया दिखा नहीं, अचानक नेता ने चिल्लाना शुरू किया एक अजीब आवाज- कई बहेलिये सामने खड़े थे नेता उड़ने के लिए तैयार बहेलिये की मुस्कुराहट और नेता की हड़बड़हाट एक सहमति थी । हम एक कुटिल चाल के शिकार नेता अपने हिस्से को ले उड़ चुका था बहेलिया एक कुशल शिकारी निकला सारे के सारे कबूतर पिजड़े में, अब हम सब अकेले। इन्हीं नेता के हाथ आजाद होने की किस्मत लिए किसी राष्ट्रीय पर्व में बन जाएंगे शांति प्रतीक। फिर कोई नेता और बहेलिया हमें पहुंचा देगा पिजड़ों में।  यथार्थ वह दीवारों से निकल गई विचारों से लड़ रही सही मायने में मकानों को घरों में तब्दील कर रही यर्थाथ है उसका जीवन चूल्हों पर लिपी आंसू नहीं उर्ज़ा है अणु परमाणु की आसमान में बादलों की नीर नहीं  केंद्र बिदु है समाज की नजरें लटकती लाशें उस हुक्मरान के ख

नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाष सत्यार्थी और मलाला पर सवाल क्यों?

नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाष सत्यार्थी और मलाला पर सवाल क्यों? अभिषेक कांत पाण्डेय नोबेल पुरस्कार और फिर इसमें राजनीति यह सब बातें इन दिनों चर्चा में है। देखा जाए तो विष्व के इतिहास में दूसरे विष्व युद्ध के बाद दुनिया का चेहरा बदला है। आज तकनीकी के इस युग में हम विकास के साथ अषांति की ओर भी बढ़ रहे हंै। विष्व के कई देष तरक्की कर रहे, तो वहीं अषांति चाहने वाले आज भी मध्ययुगीन समाज की बर्बबरता को आतंकवाद और नष्लवाद के रूप में इस धरती पर जहर का बीज बो रहे हैं। एषिया में बढ़ रहे आतंकवाद के कारण शांति भंग हो रही है। ऐसे में शंाति के लिए दिये जाने वाले नोबेल पुरस्कार को राजनीति के चष्में से देखना ठीक नहीं है। बहुत से लोग विष्व शांति के लिए आगे बढ़ रहे हैं। पाकिस्तान की मलाला यूसूफजई को उसके साहस और तालिबानी सोच के खिलाफ उसके आवाज को विष्व में सराहा गया है, ऐसे में मलाला यूसुफजई को दिया गया ष्शांति का नोबेल पुरस्कार की वह सही हकदार भी है। वहीं भारत के कैलाष सत्यार्थी को बेसहारा और गरीब बच्चों को षिक्षा और उनका हक दिलाने के लिए नोबेल का पुरस्कार दिया गया है। संयुक्त रूप से मिला यह नोबेल पुरस

हम पिंजड़ों में

हम सब ने एक नेता चुन लिया उसने कहा उड़ चलो ये बहेलिया की चाल है ये जाल लेकर एकता शक्ति है। हम सब चल दिये नेता के साथ नई आजादी की तरफ हम उड़ रहे जाल के साथ आजादी और नेता दोनों पर विष्वास हम   पहुंच चुके थे एक पेड़ के पास अब तक बहेलिया दिखा नहीं अचानक नेता ने चिल्लाना शुरू किया एक अजीब आवाज - कई बहेलिये सामने खड़े थे नेता उड़ने के लिए तैयार बहेलिये की मुस्कुराहट और नेता की हड़बड़हाट एक सहमति थी । हम एक कुटिल चाल के षिकार नेता अपने हिस्से को ले उड़ चुका था बहेलिया एक कुषल षिकारी निकला सारे के सारे कबूतर पिंजड़े में , हम सब अकेले। इन्हीं नेता के हाथ आजाद होने की किष्मत लिए किसी राष्ट्रीय पर्व में बन जाएंगे शांति प्रतीक फिर कोई नेता और बहेलिया हमें पहुंचा देगा पिंजड़ों में।                   अभिषेक कांत पाण्डेय

अहिंसा और सादगी mahatma ghandhi jyanti

अहिंसा और सादगी   anuched hindi lekhan nibndh lekhan: 2 अक्टूबर महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री का जन्म दिवस है। एक अहिंसा और दूसरे सादगी के प्रणेता। सभ्य समाज में शांति का महत्व है, यह शांति समाजिक न्याय से आती है। शांति और सादगी दोनों एक दसरे से जुड़े हैं। जीवन में सादगी की जगह अगर हम दिखावा करने पर उतारू हो जाते हैं, तब हम दूसरों की शांति भंग करना शुरू कर देते हैं। खूब बड़ा बंगला, कार, हीरे जवाहरात, रूपयों की गड्डी और इस सब पाने के लिए झूठ और भ्रष्टाचार का सहारा लेना शुरू करते हैं।  गांधी जी एवं लाल बहादुर जी का व्यक्तिव्य विशाल है, जिसमें जीवन की सादगी, दया—करूणा के साथ हर इंसान के सुख—दुख की बात करता हमारे सामने है। अफसोस तब होता है जब आज के नेता का व्यक्तिव्य केवल सुख—सुवधिा के पीछे भागता है, सेवा भाव समाप्त और उपदेश देने के लिए सबसे आगे रहते हैं, चाहे वह जिस तकिए पर सो नहीं पाते हैं, वह महात्मा गांधी के चित्रांकित 500 व हजार की गड्डी वाली होती है। ऐसे में हाय कमाई करने वाले ऐसे लोग सही मायने में लोगों के हक को हड़प कर जाते है। जिस तरह से हर साल फोर्बस पत्रिका में रइसों

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सफलता!

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सफलता! अभिषेक कांत पाण्डेय न्यू इंडिया प्रहर डेस्क लखनऊ। चुनाव के वक्त नरेंद्र मोदी ने विकास का वायदा किया था, इस वायदे को पूरा करने और सबकों को साथ लेकर चलने की राह पर नरेंद्र मोदी का ऐजेण्डा सामने आ चुका है। एक सवाल उठता रहा कि क्या भारतीय जनता पार्टी में मुसलमानों को लेकर सोच मे बदलाव आया है कि नहीं? जब भाजपा के सांसद का लोकसभा में बयान के बाद हंगामा हुआ तब और अब जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पहले इंटर नेष्नल इंटरव्यू में अलकायदा की चिंता को खारिज कर दिया और कहा कि अगर किसी को लगता है कि उनकी धुन पर भारतीय मुस्लिम नाचेंगे तो वह भ्रम है। भारत के मुसलामान देष के लिए जीएंगे और देष के लिए मरेंगे, वे कभी भारत का बुरा नहीं चाहेंगे। प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी का यह इंटरव्यू खास मायने रखती है, जिस तरह से एक समय था कि अमेरिका नरेंद्र मोदी को वीजा देने से इंकार कर दिया था। वहीं आज की परिस्थिति में विष्व के सामने नरेंद्र मोदी एक ऐसे लोकतांत्रिक देष का नेतृत्व कर रहे हैं, जहां पर हिंदू व मुस्लिम धर्म के लोग एक साथ रहते हैं। जाहिर है  कि भारत क

रूटीन

रूटीन पेड़ों पर टांग दिये गये आइनें बर्बरता की ओट में तय नफा नुकसान के पैमाने नापती सरकारें। चीर प्रचीर सन्नाटा तय है मरना जिंदगियों के साथ। सभ्य सभ्यता के साथ हाथ पे हाथ रख मौन वक्त। पेड़ों पर बर्बता लोकतंत्र झूलता पंक्षी भी आवाक नहीं सुस्ताना पेड़ों पर संसद में चूं चूं रूटीन क्या है आंसुओं का सैलाब बनना या उससे नमक बनाना ताने बाने में मकड़जाल कांपती जीती आधी आबादी दर्द मध्यकाल का नहीं आधुनिकता की चादर ओढ़े मुंह छुपाए रूटीन षब्द की हुंकार लिए ये सरकारें रूटीन ये लालफीताषाही रूटीन लटकती फीतों वाली रस्सियां पेड़ों से, रूटीन हम और आप। तैयार हमें होना रूटीन रूटीन सोच के खिलाफ। अभिषेक कांत पाण्डेय।

हम बिजली चले जाने पर

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सफलता माने नरेंद्र मोदी

                                  सफलता माने नरेंद्र मोदी                                                                                                                    अभिषेक कांत पाण्डेय चुनाव के आखिरी चरण में सभी की निगाहें वाराणसी पर लगी थी।  जिस तरह से नरेंद्र मोदी ने अमेठी में अपनी रैली के दौरान राहुल गांधी पर हमले किये उससे साफ जाहिर था कि नरेंद्र मोदी अब कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते थे। अमेठी के मौजूदा सांसद राहुल से जब वहीं के लोग यह सवाल पूछा कि आखिर इतने साल के बाद ही क्यों उनकी याद आई। सड़क की खराब हालत पर ग्रमीणों ने राहुल से प्रश्न  ऐन चुनाव के वक्त किया तो यह समझना बिल्कुल आसान है कि लोकतंत्र में जनता जब सवाल पूछती है तो नेता भी सोच में पड़ सकते हैं। इस तरह से देखा जाए तो राहुल गांधी के लिए अमेठी में चुनौती बढ़ चुकी है। इस लोकसभा चुनाव में बड़े-बड़े दिग्गजों के माथे पर सिकन ला दिया है। चाहे वह अमेठी में आम आदमी पार्टी के उम्मीद्वार डा0 कुमार विश्वास और भजापा के उम्मीद्वार  टीवी एक्टर से बनी नेता स्मृति ईरानी की चुनौती राहुल गांधी को मिली, वहीं आजमगढ़ में भाजपा के उम्मीदवार रा

कविता संग्रह समीक्षा- मीरखां का सजरा-श्रीरंग

कविता संग्रह समीक्षा-   मीरखां का सजरा-श्रीरंग समकालीन हिन्दी कविता में मीरखां का सजरा श्रीरंग की ताजा कविता संग्रह है। यह संग्रह पाठकों को आकर्षित करती हुई है।  इस संग्रह में कुल 74 कविताएं है जो नये समाज की कहानी बड़ी बारीकी से बयान करती है। श्रीरंग का यह तीसरा कविता संग्रह है, इससे पहले यह कैसा समय और नुक्कड़ से नोमपेन्ह कविता संग्रह प्रकशित हो चुके हैं। नये अनछुए पहलूओं को खींचती यह कविता संग्रह वर्तमान जीवन को समझने पर मजबूर कर देती है। लोकतंत्र को सावधान करती एक कविता में सावधान/ शाम को महराज/ एक विशाल भीड़ को सम्बोधित करेंगे/ परिवहान आधिकारी सावधान/ नगर की सभी बसें, कारें, जीपें में कविता का स्वर इर्द-गिर्द होने वाले भीड़-भाड़ का आरेख खीचती है। वहीं इस संग्रह की बहुरूपिया शीर्षक कविता में बहुरूपिया के चरित्र को दर्शाती है जहां पर ना ही उसका कोई धर्म होता है न उसकी पहचान बस चुपचाप वह बदल लेता है आपना खेमा। देखा जाए तो श्रीरंग अपने समकालीन कवियों में नये और ताजेपन के साथ दुनिया में हो रहे बदलाव के संदेशवाहक है पर संदेह से परे सच की शुरूआत भी अपनी कविता के माध्यम से करते हैं। यही ए

विश्वविद्यालय की डिग्री

विश्वविद्यालय की डिग्री   यहीं से सीखा पाया समाज में उतरने के लिए फैलाना था पंख लौट के आने वाली उड़ान भरी थी मैंने विश्वविद्यलाय की दीवारों में। दस साल बाद विश्वविद्यालय की सीलन भरी दीवार सब कुछ बयान कर रही  नहीं ठीक  सूखे फव्वारे अब किसी को नहीं सुख देते सलाखों में तब्दील विश्वविद्यालय। समय बदल गया पर मेरी डिग्री वही याद वहीं  इमारतों के घोसले भी गायब पंख नहीं मार सकती चिड़िया अजादी पैरों में नहीं विचारों में पैदा नहीं होने दी गई। विचरने वाले पैसों में ज्ञान को बदल रहें दस साल का हिसाब मुझसे मांग रहा विश्वविद्याल की इमारतें। ंबयान कर रहा है जैसे नहीं बदला बता रही बदल गए तुम। मैंने कहा डिग्री सीढ़ा गई सीलन भरी दीवार में अटकी  फांक रही है धूले मैंने सीख लिया है  नया ताना बाना, विश्वविद्यालय सीखने को नहीं  नहीं बदलने को तैयार मैंन भी निकाल ली अखबार की कतरने  दिखा दिया बेरोजगार डिग्री  गिना दिया दफन हो गई डिग्रियों के नाम  कल आज में, बिना डिग्री वाला नाम  तुझ पर इतिहास बनाएगा  तुझे नचाएगा डिग्री वाले ताली बजाएंगे

2014 में आप से बदलाव की ओर राजनीति

2014 में आप से बदलाव की ओर राजनीति अभिषेक कांत पाण्डेय भारतीय राजनीति में इस समय वह दौर चल रहा जहां बदलाव आवश्यक है। आप पार्टी इस बदलाव की अग्नि पथ पर चलना शुरू कर दिया है। 2014 का साल आप के साथ ही सभी राजनीति पार्टियों के लिए महत्वपहूर्ण होने वाला है। वहीं एक साल से ज्यादा समय पुरानी आप पार्टी अपनी परिपक्व अवस्था में है। विधान सभा में दिल्ली में पहली बार चुनाव लड़ने वाली आम पार्टी ने 28 सीटें लेकर राजनीति के महान धुरंधरों की बोलती बंद कर दी है। क्या है यह जादू , क्या यह अरविंद केजरीवाल का व्यक्तित्व है या भारतीय राजनीति में वर्तमान पार्टियों के खिलाफ उनके कार्यशैली के प्रति आम जनता का विरोध है। यह बड़ा सवाल आज सभी के मन में है। 2014 में लोक सभा चुनाव भी है। दो धुरी पर खड़ी तो पर्टियां काग्रेस और भाजपा के बीच चुनावी बिगुल बज चुका है। हमें समझना होगा दिल्ली के परिदृश्य में यहां सत्ता में कांग्रेस की सरकार के विरोध स्वर को

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What is the meaning of Agniveer in hindi

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लघु-कथा' CBSE BOARD CLASS 9 NEW SYLLABUS LAGHU KATHS LEKHAN

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क्लास मानीटर बनने के टिप्स/ What are the duties of a class monitor?

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