Education funda Parenting

बच्चों के सीखने की क्षमता को कैसे बढ़ाएं

Table of Contents

Credit image unsplash

  • बच्चों के सीखने की क्षमता को कैसे बढ़ाएं

बच्चा बुद्धिमान है पर उसका और चीजों में मन लगता है लेकिन पढ़ाई में उसका मन नहीं लगता है।
बच्चे की राइटिंग और रीडिंग स्किल मे दिक्कत होती है तो समझ जाइए कि यह स्थिति डिक्लेसिया की है, हिंदी में इसे पठन विकार व लेखनविकार कहते हैं। यानी कि बच्चे का बौद्धिक स्तर तो ठीक है। लेकिन उसे लिखने पढ़ने या किसी विशेष स्पेलिंग, वर्तनी को याद करने में कठिनाई होती है। इस समस्या के कारण बच्चा अपनी कक्षा में लगातार पिछड़ता चला जाता है। उसका पढ़ाई में मन नहीं लगता है।


Credit image unsplash

शोधकर्ताओं ने नामी-गिरामी स्कूल के बच्चों पर 1 साल तक किया रिसर्च


 कानपुर के आईआईटी विशेषज्ञों ने ऐसे बच्चों पर एक रिसर्च किया जिसमें पाया कि डिक्लेसिया के शिकार बच्चे बौद्धिक रूप से ठीक है। लेकिन उन्हें पढ़ने-लिखने में समस्या होती है। ऐसे बच्चों पर एक साल तक किए गए रिसर्च किया तो रिसर्चर  ने यह देखा कि डिक्लेसिया के शिकार बच्चों में गंदी राइटिंग और पढ़ने में अटकते हैं। उनके घर की पृष्ठभूमि को पता किया तो मालूम चला कि वह जेनेटिक रूप से बौद्धिक माता-पिता की संतान हैं। यानी कि इससे पता चलता है कि बच्चे के बौद्धिक क्षमता सही होती है लेकिन पढ़ने-लिखने में ऐसे बच्चे कठिनाई महसूस करते हैं।

पठन विकार यानी डिक्सलेसिया से प्रभावित बच्चों की भाषा का नहीं हो पाता सही से विकास 

डिक्लेसिया से प्रभावित बच्चों में भाषा का सही विकास नहीं हो पाता है। वे कविता कहानी आदि को समझ नहीं पाते हैं। यह समस्या अगर नर्सरी कक्षा में है तो धीरे-धीरे इस पर ध्यान न दिया गया तो अगली कक्षा में यह बीमारी विकट रूप धारण कर लेती है। अगर आपका बच्चा इन समस्याओं से गुजर रहा है तो आपको तुरंत साइकोलॉजी  की मदद लेनी चाहिए।

डिक्लेसिया बीमारी प्रभावित बच्चों की क्या-क्या है समस्याएं


डिक्लेसिया बीमारी से प्रभावित बच्चे में समस्याएं अलग-अलग हो सकती हैं। जैसे कुछ बच्चों में बोलने और लिखने में समस्या हो सकती है तो कुछ बच्चों में नए शब्दों को याद करने में परेशानी होती है। इस कारण से इन बच्चों का मन पढ़ने में नहीं लगता है। लेकिन ऐसे बच्चे किसी विशेष योग्यता वाले भी होते हैं- जैसे, पेंटिंग, स्पोर्ट, डांस आदि में विशेष योग्यता वाले होती हैं।।
डिक्लेसिया से प्रभावित बच्चों में व्याकरण और नई भाषा सीखने में कठिनाइयां देखी जाती है।

इन बच्चों को प्यार दुलार और उपचार की जरूरत है


ऐसे बच्चे टीचर के उपेक्षा का शिकार होते हैं क्योंकि इनकी कक्षा में परफॉर्मेंस बहुत ही आ संतोषजनक होती है ऐसे बच्चे पढ़ाई के अलावा अन्य चीजों पर ज्यादा ध्यान देते हैं, लिखने और पढ़ने में आलस दिखाते हैं। इन बच्चों के लिए तुरंत मनोवैज्ञानिक उपचार करने की आवश्यकता है।


आइए जानते हैं बच्चे के सीखने की क्षमता यानी एबिलिटी को प्रभावित करने वाले और फैक्टर के बारे में। 


 न्यूरोलॉजिकल प्रॉब्लम होता है,  जो  दिमाग तक मैसेज भेजने की क्षमता  और ग्रहण करने की क्षमता को  प्रभावित करता है ।  यदि इसे साइंस की भाषा में कहें तो या न्यूरोलॉजिकल से जरूरी समस्या है।  बच्चा के सीखने के प्रोसेस में उसका न्यूरोलॉजिकल प्रोसेस प्रभावित होता है। मानसिक अशक्तता एक न्यूरोलॉजिकल यानि तंत्रिका तंत्र से जुड़ी समस्या है जो संदेश भेजने, ग्रहण करने और उसे प्रोसेस करने की मस्तिष्क (Brain) की क्षमता  को प्रभावित करती है। 
इस प्रॉब्लम से जूझ रहे बच्चों में रीडिंग, राइटिंग, लिसनिंग और मैथमेटिकल क्वेश्चन को सॉल्व करने में प्रॉब्लम होती है। इसके साथ ही किसी विषय के कांसेप्ट को समझने में भी बच्चे को परेशानी होती है।

डिक्लेसिया बीमारी


बच्चे में इस तरह की समस्या को एक तरह की बीमारी ही कहा जाएगा। अगर बच्चे में रेटिंग स्किल कमजोर है तो वह डिक्लेसिया जैसी बीमारी से ग्रसित है।

डिस्केलकुलिया बीमारी


इसी तरह अगर बच्चे में मैथ के सवालों को समझने व कैलकुलेट करने में परेशानी होती है तो वह डिस्केलकुलिया नाम की बीमारी से ग्रसित है। 

डिसग्राफिया बीमारी

अगर बच्चा लिखने में गलतियां करता है। ब्लैकबोर्ड से सही से लिख ना सकना। अंग्रेजी के अल्फाबेट को उल्टा बनाना या हिंदी के अल्फाबेट में भेद न कर पाना यह लक्षण लिखने से संबंधित है अगर बच्चे की राइटिंग खराब है और उसका लिखने में मन नहीं लगता है तो यह लेखन विकास डिसग्राफिया कहलाता है।
ऊपर तीनों तरह की बीमारियां एक ही बच्चे में भी हो सकती है या तो इनमें से कोई एक ही हो सकता है।

ऐसे बच्चे बौद्धिक रूप से तेज होते हैं यानी कि बुद्धिमान होते हैं


एक बात आप ध्यान दीजिए की ऐसे बच्चे बौद्धिक रूप से संपन्न होते हैं लेकिन उनके लिखने-पढ़ने और गणित के सवालों को हल करने में उनके मस्तिष्क से विशेष प्रकार की बाधा होती है। दूसरी बात यह समझ ले कि बच्चा शारीरिक रूप से अक्षम नहीं होता है। बीमारियों से ग्रसित बच्चे  देख-सुन  और अपने  हाथों का प्रयोग करने में सक्षम होते हैं।  अगर  आंखों से देखने में या सुनने में कोई परेशानी होती है तो वह डिस्लेक्सिया, डिसग्राफिया या डिस्केलकुलिया के अंतर्गत नहीं आता है बल्कि  उसकी समस्या  आंखों से कम दिखना या कम सुनाई पड़ना है, जिसका रोकथाम अलग तरीके से किया जा सकता है ।  

लेकिन  शारीरिक रूप से सक्षम  बच्चे  और बौद्धिक रूप से सक्षम बच्चे  हैं लेकिन उनकी पढ़ाई का स्तर लगातार गिर रहा है ।  खासतौर पर  उनके  भाषा का विकास  और  गणित सीखने की प्रवृत्ति बहुत ही धीमी (slow) है  तो  वह  ऊपर बताए गए तीन  तरह की बीमारियों से ग्रसित हो सकते हैं उन्हें तुरंत  विषय विशेषज्ञ उपचार करने की आवश्यकता होती है। इस तरह से ग्रसित बच्चों का पहचान माता-पिता और शिक्षकों द्वारा तुरंत कर लिया जाना चाहिए और इनका ट्रीटमेंट  सही समय पर हो जाता है तो उन्हें के पढ़ने-लिखने  की स्थिति में बहुत सुधार आ सकता है।

इस समस्या से जूझ रहे बच्चों में किस कारण से होती है यह बीमारी आइए इसे जान ले।
विषय विशेषज्ञों का मानना है कि किसी बच्चे में इस तरह के विकार हैं तो इसके लिए कोई एक कारक यानी फैक्टर जिम्मेदार नहीं है बल्कि इसके लिए एक से अधिक फैक्टर जिम्मेदार होते हैं।


जीनेटिकल कारण

 अगर बच्चे के माता-पिता में सीखने की समस्या है तो वह उनके बच्चों में भी वही समस्या जेनेटिक्स रुप में पूरी आने की संभावना रहती है। 

जन्म के समय या उसके बाद बच्चे को कोई चोट लगी हो तो संभावना इस बात की है कि उसे सीखने की यह बीमारी हो सकती है। इसके अलावा गर्भ के समय में ड्रग्स या नशा आदि का सेवन करने पर भी बच्चे के दिमाग पर इसका असर पड़ता है जिससे वह सीखने की अक्षमता का शिकार हो सकता है।
बच्चे अगर ऐसे खिलौने से खेलते हैं जिनमें लेड की मात्रा या रंगो के रूप में हानिकारक विषैले केमिकल होते हैं जो उनके बढ़ते हुए दिमाग को प्रभावित करते हैं इसलिए संभावना है कि उन बच्चों में सीखने संबंधित यह रोग होने की संभावना अधिक होती है।

 सीखने में होने वाली परेशानियों  के लक्षण बच्चों में  इस तरह से पहचानें


बच्चे की शारीरिक और मानसिक विकास पर नजर रखें। अगर बच्चा सारे ग्रुप से विकास कर रहा लेकिन मानसिक रूप से उसके सीखने की गति कम हो रही है तो या समस्या आ रही है तो तुरंत सावधान होने की जरूरत है।
आमतौर पर 5% स्कूली बच्चों में सीखने से संबंधित बीमारी पाई जाती है।

यहां पर बच्चों की कक्षा के अनुसार उनमें लिखने पढ़ने की जो समस्या है उसको सरल भाषा में दिया गया है। आप उन्हें ध्यान से पढ़े और समझे।

प्रीस्कूल या नर्सरी 

जब बच्चा आपका प्रीस्कूल या नर्सरी में पढ़ रहा होता है हो सकता है उसे इस तरह की कठिनाइयां पढ़ाई में आती हो उसे आपको पहचानना होगा। इस स्टेज पर बच्चे से नीचे लिखी सीखने की की गति को वह प्राप्त कर जाना चाहिए।


सामान्य उम्र (15-18 महीने) बच्चा बोलने लगना चाहिए यानी उसके बोलने की क्षमता का विकास हो जाना चाहिए। 
सरल और साधारण शब्दों को बोल पाना।
अक्षरों और शब्दों को पहचानना।
अंक, शिशुगीत या गाने सीखना।
किसी काम पर ध्यान लगाना।
टीचर और आपके बताए नियमों का वह पालन करने लगे।
अपने शारीरिक  क्षमता का उपयोग  करता हो जैसे  वह पेंसिल से  लिखना  अपने उंगलियों से पकड़ना  और  सही तरीके से चलना आदि की कुशलता उसके अंदर आ जानी चाहिए 


प्राइमेरी स्कूल के बच्चों में यह समस्या हो सकती है इसे पहचान करना जरूरी है।


अक्षरों और उसके ध्वनियों को समझे और जैसे हीब बोला अक्षर बोला जाए तो वहां अक्षर वाली लिख ले।
एक जैसे ध्वनि जाने वाले शब्दों को अलग रूप में समझने की क्षमता होनी चाहिए जैसे नल, नाला, चल चाल शब्दों के मतलब सही से समझे।

आओ जाने डायनासोर के बारे  में




बच्चा जो बोले उसकी स्पेलिंग वह सही सही लिखने में उसे कोई कठिनाई न हो।
बच्चे में लेफ्ट और राइट शब्दों में सही भेद करने की समझ हो जैसे 52 और 25 या d  व b में कोई कंफ्यूजन नहीं होना चाहिए। S को 5 समझ लेने की समस्या।

 वर्णमाला के अक्षरों को पहचानने में।

गणित के सवालों को हल करने के लिए मैथमेटिकल सिंबल को सही तरीके से समझने की समझ होनी चाहिए।
संख्याएं और फैक्ट याद करने में परेशानी ना हो।
नई चीज़ सीखने में बच्चा अपनी उम्र के बच्चों से धीमा सीखता हो।
कविता याद रखने में और उसका विश्लेषण करने में कठिनाई अनुभव करता हो।
सुबह शाम तारीख घड़ी के समय को समझने में कठिनाई अनुभव करता हो।

हाथ और आंख के तालमेल से किसी दूरी और गति को समझने का अनुमान लगाने में असमर्थ हो।
छोटे-छोटे कुशलता वाले कार्य करने में उसे परेशानी होती हो जैसे टाई बांधना जूते का फीता बांधना शर्ट का बटन बंद करना आदि।

अपनी चीजों का ख्याल रखना ना आता हो कॉपी पेंसिल आदि स्कूल में उसकी खो जाती हो।

इस तरह के विकार या बीमारी होने के कारण भी बच्चा किसी एक विषय में बहुत ही तेज भी हो सकता है।

इस समस्या के समाधान के लिए अभिभावक और शिक्षक पहले ही चरण में बच्चों के इन विकारों में सुधार लाया जा सकता है उनके सीखने की क्षमता कुछ तरीकों से बढ़ाया जा सकता है।

आगे के लेख में इन समस्याओं से छुटकारा दिलाने के लिए और बच्चों के सीखने की गति को बढ़ाने के लिए कुछ उपाय बताएंगे। पोस्ट के दूसरे भाग में आप यह जान पाएंगे।आपको या पोस्ट कैसे लगी नीचे टिप्पणी करना ना भूले।

टिप्पणी- यह लेख केवल जानकारी के लिए है ,उपचार के लिए विषय विशेषज्ञ की मदद लें।

ये भी देखें 

इस लेख में गांधीजी और पर्यावरण के पवित्र इकोनॉमिक्स के बारे में क्लिक करें

About the author

admin

Hello friends!
New Gyan tells the words of knowledge with educational and informative content in Hindi & English languages. new gyan website tells you new knowledge. This is an emerging Hindi & English website in the Internet world. Educational, knowledge, information etc. new knowledge, new update, new method in a very simple and easy way.
Founder of Blog Founder of New gyan.

A. K Pandey - Teacher, Writer - Journalist, Blog Writer, Hindi Subject - Expert with more than 15 years of experience. Articles on various topics have been published in various magazines and on the Internet.
Educational Qualification- Master of Art. Professional Qualification-
Diploma in Journalism from Allahabad University, Master of Journalism and Mass Communication, B.Ed.

Leave a Comment