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अक्तूबर, 2019 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

रेनबो की दुनिया इंद्रधनुषी सतरंगी दुनिया

रेनबो की दुनिया इंद्रधनुषी सतरंगी दुनिया How many Rainbow बारिश के मौसम में सतरंगी इंद्रधनुष देखा होगा लेकिन क्या आपको मालूम है कि इंद्रधनुष कई तरह के होते हैं। इनमें से कुछ तो चांद की रोशनी में भी बनते हैं, तो कुछ अंधेरी रात में भी, तो कुछ चमकते हुए सूरज के चारों ओर दिखाई देते हैं। तो जाने आसमान में बनने वाले अनोखे इंद्रधनुषों के बारे में- क्लाउडबो cloudbow यह कैसा रेनबो है, जो बहुत छोटा होता है। इसके रंग आपस में मिले रहते हैं। यही कारण है यह इंद्रधनुष सफेद दूधिया रंग का होता है। यह जल की नन्हीं नन्हीं बूंदों से बनता है। यह इंद्रधनुष शाम के समय ही आकाश में दिखाई देता है। जब बारिश खूब होती है और वातावरण में बहुत उमस होने लगती है तो इस तरह का इंद्रधनुष आसमान पर आप देख सकते हैं। लेकिन, हां! इंद्रधनुष को देखने के लिए आपको दूरबीन की जरूरत पड़गी। गोलाकार इंद्रधनुष कभी-कभी पानी की बूँदें इस तरह से सूर्य के प्रकाश के कारण रिफ्लेक्ट होती है कि आसमान में सूरज के चारों ओर रिंग यानी गोले के आकार के रूप में इंद्रधनुष बनता   दिखाई देता है। ऐसा नजारा बारिश के बाद तेज धूप के कार

सुनील विश्वकर्मा: छोटे गांव से मुंबई के फिल्मों में आर्ट डायरेक्टर तक का सफर

सुनील विश्वकर्मा:  छोटे गांव से मुंबई के फिल्मों में आर्ट डायरेक्टर तक का सफर Film Bagpat ka Dulha Art director Sunil Vishvakarma आखिर रंग लाई 14 साल की कड़ी मेहनत सुनील विश्वकर्मा सोरांव के छोटे से गांव गधिना से मुंबई की फिल्मों में आर्ट डायरेक्टर तक का सफ़र छोटे शहर के युवाओं के सपने को पंख हाथों की लकीरों से नहीं उसके मेहनत से मिलती है। फिल्मों में कॅरिअर बनाने की चाहत के लिए छोटे शहरों की प्रतिभाएं मेहनत और संघर्ष के रास्ते चलकर दुनिया में नाम और शोहरत हासिल करते हैं तो मिसाल बन जाता है। किसान परिवार में जन्म लेनेवाले प्रयागराज सोरांव तहसील के छोटे गांव गधिना के युवा ने अपनी कला की पहचान बॉलीवुड की फल्मों से बनाई। सुनील विश्वकर्मा ने अपने शहर व गांव का नाम ही रोशन नहीं किया है, साथ में उन युवाओं के रोल मॉडल भी बन गए, जो छोटे शहरों के शांत वातारण में अपने कला व एक्टिंग की प्रतिभा लिए ग्लेमर की दुनिया बॉलिवुड में कॅरिअर बनाने के लिए संघर्ष का रास्ता अपनाते हैं। ऐसे महान लोग जिन्होंने विकलांगता को पछाड़ दिया खेल का महत्व स्कूल में जाने इस लेख से 15 नवंबर को फेम फैक्टर

वल्लभभाई पटेल का जन्म दिवस राष्ट्रीय एकता दिवस' के रूप में मनाया जा रहा है

वल्लभभाई पटेल का जन्म दिवस ' राष्ट्रीय एकता  दिवस' के रूप में मनाया जा रहा है National intregation day 31 अक्टूबर सन 2019 को भारत के पहले गृह मंत्री और उप प्रधानमंत्री श्री वल्लभ भाई पटेल का जन्म दिवस एकता दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे और भारत की एकता को कायम रखने वाले लौह पुरुष को स्मरण करेंगे।  भारतवासी वल्लभ भाई पटेल के योगदान को कभी भी भुला नहीं सकते हैं। आज हम एक भारत के सपने को साकार कर रहे हैं, उसकी शुरुआत बल्लभ भाई पटेल ने आजादी के बाद बिखरे हुए देसी रियासतों को भारत के संविधान में शामिल कर भारतीय संस्कृति और सभ्यता को छिन्न-भिन्न होने से बचाया था। आइए पढ़ें एक विद्यालय के लिए स्पीच, जो  'राष्ट्रीय एकता दिवस ' पर वल्लभ भाई पटेल के योगदान को स्मरण कराते हैं। स्कूल के लिए स्पीच आदरणीय प्रधानाचार्य महोदया  आदरणीय अध्यापकगण एवं विद्यालय में पढ़ने वाले समस्त छात्रगण आज बड़े खुशी का दिन है। आज के दिन हमने आजादी के बाद एक ऐसी आजादी प्राप्त की जहां भारत के लोग एकता के सूत्र में बं

एक गांव जो बसा है समुद्र पर

एक गांव जो बसा है समुद्र पर A village that is located on the sea अजब गजब समुद्र पर बसा गांव क्या आपने कभी ऐसे घर की कल्पना की है जो पानी के ऊपर हो दुनिया में एक ऐसी बस्ती है जो पानी के ऊपर बसी है और वह भी पूरे 7000 लोगों की। दुनिया की इकलौती समुद्र पर तैरती हुई बस्ती चीन में है। यह बस्ती समुद्री मछुआरों की है जिन्हें टाका कहते हैं। चीन में सदियों पहले टांका समुदाय के लोग वहां के शासकों के  उत्पीड़न से इतने नाराज हुए कि उन्होंने समुद्र पर ही रहना तय किया था और विराम करीब 700 ईसवी से लेकर आज तक यह लोग ना तो धरती पर रहने को तैयार हैं और ना ही आधुनिक जीवन अपनाने को तैयार हैं। चीन के दक्षिण पूर्व क्षेत्र में करीब 7000 मछुआरों के परिवार नामों के मकान में रह रहे हैं। यह मकान समुद्र पर तैर रहे हैं। इन विचित्र घरों की एक पूरी बस्ती है। समुद्री मछुआरों की बस्ती फोजियान राज्य के दक्षिण पूर्व की निगम डे सिटी के पास समुद्र में तैर रही है। यह समुद्री मछुआरे तांगा कहलाते हैं। टांका लोग नाव से बनाएं घरों में रह रहे हैं इसलिए उन्हें जिप्सीज ऑफ द सी कहा जाता है। अजब गजब चीन में

पूर्वजों के बालों से सजती है चीन की लड़कियां

पूर्वजों के बालों से सजती है चीन की लड़कियां Ajab Gajab  साउथवेस्ट चीन के गुइझाऊ में मिआओ जनजाति रहती है। कहा जाता है कि कुछ लोग के लिए उनका इतिहास किताबों में होता है लेकिन में मिआओ समुदाय के लिए उनका इतिहास उनके सिर पर होता है। ऐसा मिआओ समुदाय की एक विशेष परंपरा के कारण कहा जाता है। मिआओ समुदाय की औरतें अपने पूर्वजों के बालों से तैयार ड्रेस जिसे एक तरह का विग भी कह सकते हैं पहनती हैं, समुदाय में महिलाएं कंघी करते वक्त निकलने वाले बालों को फेंकती नहीं बल्कि उन्हें इकट्ठा करती हैं।  यह रिवाज यहां पर सदियों से जारी है और आज भी इसकी बड़ी कड़ाई से पालन किया जाता है। सदियों से इस तरह से इकट्ठे होते पूर्वजों के बालों से मिआओ समुदाय की स्त्रियां सिर पर पहने जाने वाली एक विशेष प्रकार की ड्रेस बनाती है, जिसे की लकड़ी से बने सिंह के ऊपर बनाया जाता है और इसमें लकड़ी का उपयोग किया जाता है क्योंकि में मिआओ कबीले में हिंदू धर्म की तरह गायों को बहुत पवित्र माना जाता है। इसको जवान महिलाएं तथा लड़कियां विशेष अवसरों पर पहनती हैं। हर परिवार में यह बिग मां द्वारा बेटी को विरासत के तौर

बेटी बचाओ पेड़ लगाओ एक ऐसा गांव जहां बेटी पैदा होने पर लगाया जाता है पेड़

बेटी बचाओ, पेड़ लगाओ: एक ऐसा गांव जहां बेटी पैदा होने पर लगाया जाता है पेड़ beti bachao paid lagao बिहार से होकर गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग 31 पर नवगछिया से थोड़ा आगे चलेंगे तो पहुंचेंगे मदनपुर चौक। इस मदनपुर चौक से नीचे उतरकर तीनटंगा जाने वाले रास्ते पर करीब 4 किलोमीटर आगे बढ़ने पर एक साइन बोर्ड दिखाई देगा। इस पर लिखा है-"विश्वविख्यात आदर्श ग्राम धरहरा में आपका हार्दिक स्वागत है।" यह गांव विश्वविख्यात है या नहीं यह तो तय नहीं है लेकिन इतना जरूर है कि यह पिछले 3 साल से चर्चा में जरूर है। धरहरा गांव की एक खास परंपरा रही है। इस गांव में बेटियों के जन्म पर कम से कम 10 पेड़ लगाने की परंपरा है। बिहार का यह गांव सबको सीख देता है यह परंपरा कब शुरू हुई इसे लेकर भी कई मत हैं। धरहरा गांव बिहार के प्रमुख शहर भागलपुर से करीब 25 किलोमीटर दूर है। गांव की निवासी शंकर दयाल सिंह बताते हैं कि हमारे पुरखों के समय आस-पास के गांव में बेटियों के जन्म के समय उन्हें अक्सर मार दिया जाता था। इसकी एक बड़ी वजह दहेज का खर्च था। ऐसे में उनके गांव के पूर्वजों ने यह रास्ता निकाला की बेट

हिमालय पर्वत की जानकारी

हिमालय पर्वत के बारे में हिमालय उत्तर में जम्मू और कश्मीर से लेकर पूर्व में अरुणाचल प्रदेश तक भारत की अधिकतर पूर्वी सीमा तक फैला है। भारत पूरी तरह से भारतीय प्लेट के ऊपर स्थित है। यह प्लेट भारतीय ऑस्ट्रेलियाई प्लेट (Indo-Astraliyan plate)  का ही उपखंड है। प्राचीन समय में यह प्लेट गोंडवाना लैंड का हिस्सा थी। यह प्लेट अफ्रीका और अंटार्टिका के साथ जुड़ी हुई थी। आज से लगभग 9 करोड वर्ष पहले क्रिटेशियस काल में भारतीय प्लेट 15 सेंटीमीटर प्रति वर्ष की गति से उत्तर की ओर खिसकने लगी और जो इओसियन पीरियड में यूरेशियनप्लेट से टकरा गई थी। भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट के बीच स्थित स्थित भूसन्नति के गारबेज यानी अवसाद के ऊपर उठने से तिब्बत पठार और हिमालय पर्वत का  बना।  बड़ा  रहा है हिमालय पर्वत बिना कॉम्प्लान पिए यही अवसाद जमा हो जाने से सिंधु और गंगा मैदान बना। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि भारतीय प्लेट अभी भी लगभग 5 सेंटीमीटर हर वर्ष उत्तर दिशा की ओर खिसक रहा है या अली की गति कर रहा है। इस कारण से हिमालय की ऊंचाई हर वर्ष 2 मिली मीटर बढ़ रही है। यह 2 मिलीमीटर बहुत मामूली सा है लेकिन कई व

व्यापार मेला 2019 के मंच पर भरतनाट्यम नृत्य रहा आकर्षण का केंद्र

व्यापार मेला 2019 के मंच पर भरतनाट्यम नृत्य रहा आकर्षण का केंद्र प्रखर चेतना। गतिविधियां। प्रयागराज  शहर के नैनी औद्योगिक क्षेत्र में उद्योग व्यापार मेला-2019 का आयोजन किया जा रहा है। इस अवसर पर विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन देश के मशहूर कलाकारों द्वारा किया जा रहा है। इसी क्रम में 23 अक्टूबर को लोकगीत, कव्वाली और भरतनाट्यम नृत्य की शानदार प्रस्तुति की गई। Tips: तनाव से हो जाइए टेंशन फ्री 10 बातें एक टीचर के लिए जानना बहुत जरूरी है । 11 लक्षणों से स्मार्ट बच्चों को पहचानें इन्हें प्रकृति से मिला सुरक्षा कवच भूकंप क्यों आते हैं? इस अवसर पर बेथनी कॉन्वेंट स्कूल की डांस टीचर प्रेमा सिंह ने भरतनाट्यम नृत्य की प्रभावशाली प्रस्तुति से दर्शकों का मन मोह लिया। दक्षिण भारतीय भरतनाट्यम शैली नृत्य में भाव-भंगिमा और वेशभूषा का बहुत महत्त्व होता है। नृत्यांगना प्रेमा सिंह ने मंच पर नृत्य-कला का अद्भुत प्रदर्शन करते हुए उन्होंने दर्शकों के सामने करारविन्देन, पदारविन्दं एवं मुखारविन्दे यानी कि कृष्ण स्तुति  की भाव-भंगिमाओं को भरतनाट्यम नृत्य शैली द्व

बेथनी स्कूल के छात्रों ने स्कूल-प्रदर्शनी में दिखाई अपनी प्रतिभा

बेथनी स्कूल के छात्रों ने स्कूल-प्रदर्शनी में  दिखाई अपनी प्रतिभा  मुझे (अभिषेक कांत पांडेय) प्रयागराज के नैनी क्षेत्र स्थित 'बेथनी कॉन्वेंट विद्यालय' में 'हिन्दी-विषय' की प्रस्तुति का मूल्यांकन यानी कि जज की भूमिका  निभाने का अवसर प्राप्त हुआ। मेरा व्यक्तिगत मानना है कि कठिन परिश्रम का अवलोकन प्रकृति स्वयं ही करती है और यथा समय उस व्यक्ति के अथक परिश्रम का सुफल परिणाम प्रदान करती है। इस विद्यालय के छात्रों ने अपने विषय की विशेष प्रस्तुति में सफलता का कीर्तिमान बनाया है। हिन्दी एवं संस्कृत विषय को साहित्य के साथ ही ज्ञान एवं विज्ञान के साथ संलग्न करने का मेरा प्रयास सदैव रहता है। वर्तमान में छात्र हिन्दी रूपी माता के आँचल में बैठकर ज्ञान, विज्ञान और साहित्य के अनेक रहस्यों का रहस्योद्घाटन कर रहे हैं, अपनी भाषा से जुड़े ये संवेदनशील बालक-बालिकाएँ एक नए युग में प्रवेश कर 'नव भारत' के निर्माण करने के लिए संकल्पित हैं। आओ जाने डायनासोर के बारे  में पहचानिए अपने विचारों की शक्ति आओ हम एक हो जाएं: नेक सलाह Tips: तनाव से हो जाइए टेंशन फ्री

बच्चों के सीखने की क्षमता को कैसे बढ़ाएं

Credit image unsplash बच्चों के सीखने की क्षमता को कैसे बढ़ाएं बच्चा बुद्धिमान है पर उसका और चीजों में मन लगता है लेकिन पढ़ाई में उसका मन नहीं लगता है। बच्चे की राइटिंग और रीडिंग स्किल मे दिक्कत होती है तो समझ जाइए कि यह स्थिति डिक्लेसिया की है, हिंदी में इसे पठन विकार व लेखनविकार कहते हैं। यानी कि बच्चे का बौद्धिक स्तर तो ठीक है। लेकिन उसे लिखने पढ़ने या किसी विशेष स्पेलिंग, वर्तनी को याद करने में कठिनाई होती है। इस समस्या के कारण बच्चा अपनी कक्षा में लगातार पिछड़ता चला जाता है। उसका पढ़ाई में मन नहीं लगता है। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, इंदिरा गांधी के बचपन में देशभक्ति का जज्बा Bhagat Singh, Chandrashekhar Azad, Indira Gandhi's childhood patriotic spirit आजादी के गुमनाम नायक Credit image unsplash शोधकर्ताओं ने नामी-गिरामी स्कूल के बच्चों पर 1 साल तक किया रिसर्च  कानपुर के आईआईटी विशेषज्ञों ने ऐसे बच्चों पर एक रिसर्च किया जिसमें पाया कि डिक्लेसिया के शिकार बच्चे बौद्धिक रूप से ठीक है। लेकिन उन्हें पढ़ने-लिखने में समस्या होती है। ऐसे बच्चों पर एक

चांद से गुजारिश कविता

चांद से गुजारिश चांद का बदलना जारी अब चांद संभल जा आखिरी चेतावनी। चांद एक रोटी का टुकड़ा नजर आता है, और आधा चांद नजर आता किसी से छीना झपटी में किसी का खाया हुआ हिस्सा, चांद सावधान हो जा तेरी तरफ बढ़ते इंसानी कदम छुपा के रखना अपना पानी इतना खुदगर्ज इंसान लगातार जलाए जा रहा है कार्बन हे चांद! तूने तो देखा होगा न धरती को हंसते खिलखिलाते तू तो वहां से देख रही होगी प्रदूषण से डगमगाती धरती उसके बुखार की ताप सुना है कि कुछ इंसान आए थे तुम्हारे पास तुम्हें भी पॉलिथीन का दे गए उपहार। डर मत चांद न छुपना अब बादलों में ले ले एक पेन आकाश के पन्नों पर लिख दे अपनी व्यथा लिख दे पीड़ित धरती की कथा दिखा दे इंसान को आइना उसके भयानक अंत का, फिर भी न सुधरे इंसान तो भगवान से लगा दो गुहार बचा लो मेरी इकलौती धरती को प्रदूषण के कहर से! मैं पुकार रहा हूं अधमरा इंसान! रोचक जानकारी लखनऊ की भूलभुलैया के बारे में पढ़ें आखिर क्यों बनाया गया भूलभुलैया उसके पीछे के राज   जानने के लिए पढ़ें 11 लक्षणों से स्मार्ट बच्चों को पहचानें Tips: तनाव से हो जाइए टेंशन फ्री नई पहल  नए

Tips बच्चों से मोबाइल की आदत कैसे छुड़ाएं

Tips बच्चों से मोबाइल की आदत कैसे छुड़ाएं Parenting 90 के दशक से तकनीकी बदलाव ने दुनिया को बदल दिया। घर-घर में केबल टीवी से जुड़े रहने के कारण बच्चे अधिकतर टीवी देखते रहते थे। आज भी टीवी देखने में हर भारतीय 4 घंटे प्रतिदिन समय बिताते हैं। 90 के दशक में भारतीय माता-पिता अपने बच्चे को अधिक टीवी देखने से मना करते थे।  उनकी आंखों पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव की लेकर चिंता रहती थी।  आज हम बात करेंगे बच्चों में स्मार्टफोन की लत के बारे में। आज भारतीय माता-पिता और दुनिया के अन्य देशों के माता-पिता भी बच्चों के मोबाइल इस्तेमाल करने को लेकर चिंतित है। इस पूरे आर्टिकल में इन्हीं बिंदुओं पर चर्चा करेंगे। पहला नजरिया हमारा यह होगा कि मोबाइल का उपयोग बच्चों के लिए क्या जरूरी है? दूसरी दृष्टि यह डालेंगे कि आखिर बच्चों में मोबाइल फोन की बुरी लत को हम कैसे छुड़वा सकते हैं। ' इस तकनीकी युग में बिना मोबाइल के हम एक पल भी नहीं रह सकते हैं।'   ऊपर का वाक्य जितना सच है, उतना ही झूठ भी है। असल में हमने 24 घंटे, जब तक जागते हैं और सोने के समय में भी मोबाइल को अपनी आदत नहीं 'नशा&