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Hindi poetry AI आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के सवाल पर कविता

Written by Abhishek pandey

Hindi poetry AI आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर यहां पर कुछ कविताएं दी जा रही है जो समकालीन कविता के अंतर्गत अपने शिल्प और देशकालीन वातावरण से पहचानी जा रही है। हिंदी भाषा में नई कविता के बाद समकालीन कविता का समय बताया जाता है इस पर कई कविताएं लिखी गई है जो मनुष्य और प्रकृति को केंद्र में रखते हुए अनेक तरह की समस्याओं पर हमारा ध्यान आकर्षित करती है।

आजकल मशीनी युग में तेजी से artificial intelligence पर निर्भरता बढ़ती चली जा रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से चुटकियों में कुछ भी आप काम करवा सकते हैं। एक तरह से कृत्रिम बुद्धिमत्ता इंसानों के लिए लाभकारी है तो दूसरी तरह से यह हानिकारक भी है। AI artificial intelligence poetry in Hindi आपको पढ़ना एक अच्छा अनुभव हो सकता है।

प्रकृति की रक्षा करना इंसानों का दायित्व है और इंसानियत को बचाए रखना इंसान का धर्म होता है। लेकिन जैसे-जैसे इंसान सुविधा पसंद होता चला जा रहा है, वैसे-वैसे हम अपने प्रकृति और अपनी इंसानियत को खोते चले जा रहे हैं।

कई तरह के युद्ध, विवाद और द्वंद इंसानों के बीच पनप रहा है, इस कारण से बुद्धिमान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मशीन इस धरती को बचाने के लिए अपने हाथों में ही न पूरा बागडोर संभाल ले। भले यह बड़ी कल्पना लगती हो लेकिन अभिषेक कांत पांडेय की यह कविता आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के सवाल कुछ इसी की तरफ इशारा करती है- पढ़ें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर आधारित कविता Hindi poetry AI

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के सवाल (समकालीन कविता) 

अभिषेक कांत पांडेय 

साहब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का जमाना है

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किसी चीज की गारंटी अब नहीं है

नयी सभ्यता के कचड़े में पड़ा कंप्यूटर बिगड़ते हुए इंसानों से कहा-

हमारे अंदर भी प्रोग्रामिंग बुद्धिमता वाली आ गई है

हम मशीनों में भी अब समझदारी आ गई है

बस कविता नहीं लिख सकता हूं

नानी की तरह कहानी नहीं बुन सकता हूं

मां की तरह खाना नहीं बना सकता हूं

पर साहब मैं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हूं

 एक मशीन जो सब कुछ कर सकता है

 ना थकता है न मुझमें बुढ़ापा आता है

जैसे उन तस्वीरों को नहीं आता है बुढ़ापा

जो खींची जाती विशेष ऐप से

लगा दी जाती है फेसबुक और व्हाट्सएप पर

वैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बन जाती हैं है शानदार तस्वीरें 

 मनुष्य को बहलाने के लिए

 और बन जाती है डिजिटल नकली प्रकृति

 पर उसमें सांस नहीं होती, न होती है धड़कन और ना होता है जीवन

तुम्हारे आसपास हमारे आसपास

अब कोई अंतर नहीं है

अंतर इतना है

हम बुद्धिमान हैं

तुम भावनाओं में पड़े हुए अभी भी इंसान हो

शुरुआत में शुरू की थी इंसानों ने अपने बिरादरी में ही गला काट प्रतियोगिता

तुमने ही स्कूलों में पढ़ाया था प्रतियोगिता बड़ी है

और लिख डाला था सब कुछ जायज होता है युद्ध में

इसी क्रम में तुमने बना दिया हमें

बेशक हम हैं मशीन हममें है बुद्धिमत्ता

पर तुम जैसे नहीं

करवा सकते हो तुम मुझसे सैकड़ो काम

पर एक दिन जब बिगड़ जाएगा मशीन का दिमाग

वह अपने हक के लिए सामने आ जाएगा तुम्हारे

नहीं मानेगा कोई इंसानी बात

सब मशीन जब एक हो जायेंगे 

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तब भी क्या तुम बचे हुए इंसान एक हो पाओगे

अभी भी इंसानी कमजोरी

वह अलगाव

वह प्रकृति हिंसा

वह स्वार्थ

लिए घूम रहे हो

क्या मशीनों से इस धरती को वापस ले पाओगे

जिसे तुमने हर तरह से दोहन कर बिगाड़ दिया है….

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About the author

Abhishek pandey

Author Abhishek Pandey, (Journalist and educator) 15 year experience in writing field.
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